गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकांड ] रम्भातृतीयाव्रत २१९
धान, फल और रस प्रदान करे तथा ब्राह्मणको स्वर्ण और दक्षिणासे युक्त घट प्रदान करे। सात ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार वर्षभर अगस्त्यार्घ्यव्रत करनेवाला सभी प्रकारके श्रेयप्राप्तिका अधिकारी हो जाता है।
(अध्याय ११९)
रम्भातृतीयाव्रत
ब्रह्माजीने कहा— अब मैं सौभाग्य, लक्ष्मी तथा पुत्रादिसे सम्पन्न करनेवाले 'रम्भातृतीयाव्रत'को कहूँगा। यह व्रत मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको किया जाता है। इस तिथिको उपवास रखकर व्रती कुशोदक हाथमें लेकर बिल्वपत्रसे महागौरीकी पूजा करे। इस पूजनमें कदम्ब (वृक्ष)-की दतुअनका प्रयोग करना चाहिये, किंतु पौषमासमें मरुबकके पुष्पोंसे पार्वतीके पूजनका विधान है। व्रती इस मासके व्रतमें मात्र कर्पूरका सेवनकर उपवास करता हुआ उन गौरीको कृसर (तिल-चावलका सिद्धान्न)-का नैवेद्य एवं मल्लिकाओंकी दतुअन अर्पित करे।
माघमासमें व्रतके दिन घृतपानकर उपवास करते हुए व्रतीको कल्हारपुष्प (श्वेतकमल)-से सुभद्रादेवीकी पूजा करके उन्हें मण्डका<sup>१</sup> नैवेद्य समर्पित करना चाहिये।
फाल्गुनमासमें गोमतीकी पूजाका विधान है। कुन्दपुष्पसे उनकी पूजा करके उसीकी नालको दतुअनरूपमें उन्हें निवेदित करे और स्वयं जीवा<sup>२</sup> (जीवन्ती)-का भक्षणकर शष्कुली<sup>३</sup> (पूड़ी)-का नैवेद्य लगाये।
चैत्रमासमें भगवती विशालाक्षीको दमनक-पुष्प, तगर<sup>४</sup> काष्ठकी दतुअन और कृसरान्नका नैवेद्य अर्पित करके स्वयं दहीका प्राशन करे। वैशाखमासमें श्रीमुखीदेवीकी पूजा कर्णिकार (कनैल)-के पुष्प, वटवृक्षकी दतुअनसे करनी चाहिये और व्रतीको अशोककलिकाका प्राशन करना चाहिये।
ज्येष्ठमासमें नारायणीदेवीका पूजन शतपर्णी (छितवन)-के पुष्प एवं दतुअनसे होता है। इस पूजामें देवीको खाँड़का नैवेद्य प्रदानकर स्वयं उपासक लौंगका भक्षण करे। आषाढ़मासमें माधवीकी पूजा करनी चाहिये। इस मासमें व्रती तिलका प्राशन करे और भगवती माधवीकी बिल्वपत्रसे पूजाकर खीर और वटक (घृतपक्व मधुर पिष्टक)-का नैवेद्य अर्पित करे। इस पूजनमें देवीके लिये गूलरकी दतुअन प्रदान करनी चाहिये। श्रावणमासमें क्षीरान्न तथा मल्लिकाकी दतुअन देकर तगरके फूलसे श्रीदेवीकी पूजा करनी चाहिये।
भाद्रपदमासमें सिंघाड़ेका आहारकर व्रतीको उत्तमादेवीके लिये गुड़़का नैवेद्य अर्पित करके पद्मपुष्पोंसे पूजा करनी चाहिये।
आश्विनमासमें राजपुत्रीका पूजन जपापुष्पसे करके उन्हें जीरेसे सुवासित अन्नका नैवेद्य अर्पितकर रात्रिमें प्राशन करना चाहिये। कार्तिकमासमें पद्मजादेवीका जाति नामक पुष्प एवं कृसरान्नके नैवेद्यसे पूजन होता है और उपासकको पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये।
१-मण्ड—अन्न, दधि आदिका सार।
२-जीवा—शाकविशेष, शर्कराके समान मधुर पुष्पवाली लता।
३-तिल, तण्डुल, उड़दके चूर्णसे बना यवागू भी शष्कुलीका अर्थ है।
४-तगर—पुष्पवृक्ष, सितपुष्प, मदनवृक्ष (टगर)।