भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

इस प्रकार मार्गशीर्षसे कार्तिकमासतक वर्षकी समाप्तिपर सपत्नीक ब्राह्मणोंको घृतोदन (घृतमें पका तण्डुल) देकर उनका पूजन करना चाहिये। उसके बाद पार्वती और शिवकी गुड़ आदिसे बने नैवेद्य, वस्त्र, छत्र और सुवर्ण आदिसे पूजा करके गीत-वाद्यादिसे रात्रि-जागरण करते हुए प्रातः गौ आदिका दान देना चाहिये। ऐसा करनेसे व्रतीको सब कुछ प्राप्त हो जाता है। (अध्याय १२०)

चातुर्मास्यव्रतका निरूपण

**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं चातुर्मास्यव्रतको कहता हूँ। इस व्रतका आरम्भ आषाढ़मासकी एकादशी या पूर्णिमा तिथिमें सब प्रकारसे भगवान् हरिका पूजन करके करे। व्रतारम्भके समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

इदं व्रतं मया देव गृहीतं पुरतस्तव।
निर्विघ्नं सिद्धिमाप्नोतु प्रसन्ने त्वयि केशव॥
गृहीतेऽस्मिन् व्रते देव यद्यपूर्णे म्रियाम्यहम्।
तन्मे भवतु सम्पूर्णं त्वत्प्रसादाज्जनार्दन॥
(१२१।२-३)

हे देव! आपके समक्ष मैंने इस व्रतको ग्रहण किया है। हे केशव! आपके प्रसन्न होनेपर मुझे निर्विघ्न सिद्धि प्राप्त हो। हे देव! ग्रहण किये गये इस व्रतकी अपूर्णतामें ही यदि मैं मृत्युको प्राप्त हो जाता हूँ तो भी हे जनार्दन! आपकी कृपासे यह मेरा व्रत पूर्ण हो।

इस प्रकार हरिका पूजन करके व्रत, पूजन और जपादिका नियम ग्रहण करना चाहिये। जो हरिके व्रतको करनेकी इच्छा करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। साधक स्नान करके भगवान् हरिका पूजन कर इस पूजा तथा जपादिकी विहित क्रियाओंकी पूर्तिका संकल्प ले तथा आषाढ़ आदि चार मासोंतक एकभक्तव्रत करता हुआ विष्णुकी पूजा करे। ऐसा करनेवाला विष्णुके परम पवित्र निर्मल लोकमें चला जाता है।

मधु, मांस, सुरा और तेलका परित्याग करनेवाला जो वेदपारंगत, कृच्छ्रपादव्रती<sup></sup> विष्णुभक्त हरिका पूजन करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त हो जाता है। एक रात्रिका उपवास करनेसे वैमानिक (विमानपर चढ़कर भ्रमण करनेवाला) देवता हो जाता है। तीन रात्रिपर्यन्त उपवास कर षष्ठांश भोजन करनेसे साधकको श्वेतद्वीपकी प्राप्ति होती है। चान्द्रायणव्रत<sup></sup> करनेसे तो भगवान् हरिका लोक और मुक्ति बिना माँगे ही मिल जाती है। प्राजापत्यव्रत<sup></sup> करनेसे विष्णुलोक तथा पराकव्रत<sup></sup> करनेसे हरिकी प्राप्ति होती है।

इस व्रतमें सत्तू, यवान्नकी भिक्षा कर, दूध, दही तथा घृतका प्राशन कर, गोमूत्रयावकका आहार कर, पञ्चगव्यका पान कर अथवा सभी प्रकारके रसोंका परित्याग कर शाक-मूल-फलादिका भक्षण करते हुए जो साधक विष्णुकी भक्ति करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १२१)


१-**कृच्छ्रपादव्रत—**यह तीन दिनका व्रत है। पहले दिन दिनमें एक बार हविष्यान्न-ग्रहण, दूसरे दिन अयाचितरूपमें हविष्यान्नका एक बार ग्रहण और तीसरे दिन अहोरात्र उपवास। (याज्ञ०स्मृति, प्राय० श्लोक ३१८)
२-**चान्द्रायणव्रत—**यह व्रत अनेक प्रकारका है। मनु० ११।२१६ के अनुसार यह है—प्रतिदिन तीनों काल स्नान। पूर्णिमासे व्रतका आरम्भ। इस दिन पंद्रह ग्रास हविष्यान्नमात्र ग्रहण। पूर्णिमाके बाद कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे एक-एक ग्रास कम करते हुए अर्थात् १४, १३, १२ इस संख्यामें ग्रास ग्रहण करते हुए कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको एक ग्रास ग्रहण। तदनन्तर अमावास्याको पूर्ण उपवास। पुनः अमावास्याके बाद शुक्ल प्रतिपदासे एक-एक ग्रास बढ़ाकर १, २, ३ इस क्रममें दूसरी पूर्णिमाको पंद्रह ग्रास ग्रहण। इस प्रकार एक मासमें यह व्रत पूर्ण होता है।
३-**प्राजापत्यव्रत—**यह व्रत बारह दिनका होता है। प्रथम तीन दिन केवल दिनमें हविष्यान्न-ग्रहण। तत्पश्चात् तीन दिन केवल रातमें हविष्यान्न-ग्रहण। तदनन्तर तीन दिन बिना माँगे जो मिल जाय, उतनामात्र एक बार ग्रहण। अन्तिम तीन दिन पूर्णरूपमें उपवास। (मनु० ११।२११)
४-**पराकव्रत—**इस व्रतमें बारह दिनतक केवल जल ग्रहण करके रहा जाता है। (याज्ञ०स्मृति, प्राय० श्लोक ३२०, मनु०११।२१५)