गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 231, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ें| काण्ड ] | भीष्मपञ्चकव्रत | २२१ |
|---|
मासोपवासव्रतका निरूपण
**ब्रह्माजीने पुनः कहा—**अब मैं आपसे मासोपवास नामक उस सर्वोत्तम व्रतका वर्णन करूँगा, जिसका पालन वानप्रस्थ, संन्यासी और नारीको करना चाहिये।
आश्विनमासके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिमें उपवास रखकर तीस दिनपर्यन्त इस व्रतको धारण करनेका विधान है। व्रतारम्भके समय सर्वप्रथम भगवान् विष्णुसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
अद्यप्रभृत्यहं विष्णो यावदुत्थानकं तव।
अर्चये त्वामनश्नंस्तु दिनानि त्रिंशदेव तु॥
कार्तिकाश्विनयोर्विष्णो द्वादश्योः शुक्लयोरहम्।
म्रिये यद्यन्तराले तु व्रतभङ्गो न मे भवेत्॥
(१२२। ३-४)
हे विष्णो! आजसे लेकर जबतक आपका शयनोत्थान नहीं हो जाता है, तबतक तीस दिनपर्यन्त बिना भोजन किये ही मैं आपका पूजन करता रहूँगा। हे विष्णो! यदि मैं आश्विन और कार्तिकमासके शुक्लपक्षमें द्वादशीसे लेकर दूसरी द्वादशी तिथिके मध्य मर जाता हूँ तो मेरा यह व्रत भंग न हो।
इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् प्रातः, मध्याह्न तथा संध्याकालमें स्नान करके उपासक गन्धादिसे भगवान् हरिका देवालयमें पूजन करे, किंतु व्रतीको शरीरमें उबटन तथा सुगन्धित गन्धलेप आदि नहीं करना चाहिये।
द्वादशी तिथिमें भगवान् हरिकी पूजा करके व्रती ब्राह्मणोंको भोजन कराये। एक मासतक हरिका व्रत करनेके पश्चात् व्रती पारणा करे। यदि व्रतधारी इस अवधिके मध्य मूर्च्छित हो जाता है तो उसे दुग्धादिका प्राशन कर लेना चाहिये; क्योंकि दुग्धादिका पान करनेसे व्रत विनष्ट नहीं होता। इस प्रकार मासव्रत करनेसे भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त होती हैं। (अध्याय १२२)
भीष्मपञ्चकव्रत
**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं कार्तिकमासमें होनेवाले व्रतोंको कहूँगा। इस मासमें स्नान करके व्रतीको भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। व्रती एक मासतक एकभक्तव्रत कर, नक्तव्रत कर, अयाचितव्रत कर, दुग्ध, फल, शाक आदिका आहार कर अथवा उपवास कर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। ऐसा करनेसे वह व्रती सभी पापोंसे मुक्त होकर समस्त कामनाओंके साथ-साथ भगवान् हरिको प्राप्त कर लेता है।
भगवान् हरिका व्रत करना सदैव श्रेष्ठ है, किंतु सूर्यके दक्षिणायनमें चले जानेपर यह व्रत अधिक प्रशस्त होता है। उसके बाद इस व्रतका काल चातुर्मासमें श्रेयस्कर है। तदनन्तर इस व्रतका उचित काल कार्तिकमास है। इसके बाद भीष्मपञ्चक इस व्रतके लिये श्रेष्ठ समय है किंतु कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथि इस व्रतके शुभारम्भके लिये सर्वश्रेष्ठ काल होता है। अतः इसी तिथिसे इस व्रतका शुभारम्भ करना चाहिये। उपासक इस दिन प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन—इन तीनों सन्ध्याओंमें स्नान कर यवादि पदार्थोंसे पितृगण आदिकी नैत्यिक पूजा करनेके पश्चात् भगवान् हरिका पूजन करे। वह मौन होकर घृत, मधु, शर्करादि तथा पञ्चगव्य एवं जलसे हरिकी मूर्तिको स्नान कराये और कर्पूरादि सुगन्धित द्रव्यसे श्रीहरिके शरीरका अनुलेपन करे।
तदनन्तर व्रतीको घृतसमन्वित गुग्गुलसे पूर्णिमापर्यन्त पाँच दिनोंतक श्रीहरिको धूप देना चाहिये और सुन्दर-सुन्दर पक्वान्न तथा मिष्टान्नका