गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] शिवरात्रिव्रतकथा तथा व्रत-विधान २२३
पापात्मा निषाद राजा रहता था। वह एक बार अपने कुत्तोंको साथ लेकर आखेट करनेके लिये वनमें गया, किंतु दैववशात् उस पर्वतीय वनप्रान्तमें उसको कोई भी मृगादि जीव आखेटरूपमें प्राप्त नहीं हो सका। भूख-प्याससे पीड़ित वह रात्रिमें जलाशय और तडागोंके तटपर अवस्थित वृक्ष-लताओंके झुरमुटोंमें भटकता हुआ जागता ही रह गया। वहींपर उसे एक शिवलिंगका दर्शन हुआ। अतः उसने अपने शरीरकी रक्षाके लिये एक वृक्षकी शरण ली और निढाल होकर वहीं गिर गया, किंतु उसकी जानकारीके बिना शिवलिंगपर वृक्षके पत्ते गिर पड़े। उसने उन पत्तोंको हटाकर जलसे उस शिवलिंगके ऊपर स्थित धूलिको दूर करनेके लिये शिवलिंगको प्रक्षालित किया। प्रमादवश उसी समय शिवलिंगके पास ही उसके हाथसे एक बाण छूटकर भूमिपर गिर गया। अतः घुटनोंको भूमिपर टेककर एक हाथसे शिवलिंगको स्पर्श करते हुए उसने उस बाणको उठा लिया। इस प्रकार उस व्याधके द्वारा रात्रि-जागरण, शिवलिंगका स्नान, स्पर्श और पूजन भी हो गया।
प्रातःकाल होनेपर वह व्याध अपने घर चला गया और पत्नीके द्वारा दिये गये भोजनको ग्रहणकर क्षुधासे निवृत्त हुआ। यथोचित समयपर उसकी मृत्यु हुई तो यमराजके दूत उसको पाशमें बाँधकर जब यमलोक ले जाने लगे, तब मेरे गणोंने उन यमदूतोंको युद्धमें जीतकर व्याधको उसके पाशसे मुक्त करा दिया। अतः अपने कुत्तोंके साथ निष्पाप होकर वह व्याध मेरा पार्षद बन गया।
इस प्रकार प्राणीके द्वारा अज्ञानवश अथवा ज्ञानपूर्वक किये गये पुण्य अक्षय ही होते हैं। उपासकको चाहिये कि त्रयोदशी तिथिमें शिवका पूजन करे तथा व्रतका नियम ग्रहण करते हुए इस प्रकार प्रार्थना करे—
प्रातर्देव चतुर्दश्यां जागरिष्याम्यहं निशि।
पूजां दानं तपो होमं करिष्याम्यात्मशक्तितः॥
चतुर्दश्यां निराहारो भूत्वा शम्भो परेऽहनि।
भोक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्त्यर्थं शरणं मे भवेश्वर॥
(१२४।१२-१३)
हे देव! मैं रात्रिभर जागरण करूँगा। प्रातः चतुर्दशी तिथिमें यथासामर्थ्य आपकी पूजा, दान और हवन भी करूँगा। हे शम्भो! चतुर्दशी तिथिमें निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। हे महादेव! भुक्ति और मुक्तिकी प्राप्तिके लिये मैं आपकी शरणमें हूँ।
व्रतीको पञ्चामृतसे महादेवको स्नान कराकर 'ॐ नमो नमः शिवाय' इस मन्त्रसे उनकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर घृतसमन्वित तिल, तण्डुल एवं व्रीहिसे निर्मित चरुकी आहुति अग्निमें देकर पूर्णाहुति करे। व्रती गीतवाद्यके साथ सत्कथाओंका श्रवण करे। उसके बाद वह अर्धरात्रि, तीसरे प्रहर और चौथे प्रहरमें पुनः उनकी पूजाकर मूलमन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल आ जानेपर उनके सामने इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे—
अविघ्नेन व्रतं देव त्वत्प्रसादान्मयार्चितम्।
क्षमस्व जगतां नाथ त्रैलोक्याधिपते हर॥
यन्मयाद्य कृतं पुण्यं यद्द्रव्यस्य निवेदितम्।
त्वत्प्रसादान्मया देव व्रतमद्य समापितम्॥
प्रसन्नो भव मे श्रीमन् गृहं प्रति च गम्यताम्।
त्वदालोकनमात्रेण पवित्रोऽस्मि न संशयः॥
(१२४।१७-१९)
हे देव! हे नाथ! हे त्रैलोक्याधिपति स्वामिन् शिव! आपकी कृपासे मैं व्रतको निर्विघ्न सम्पन्न कर सका हूँ और आपकी यह पूजा भी पूर्ण हो सकी है। आप मुझे क्षमा करें। हे देव! मैंने जो कुछ आज पुण्य किया है, भगवान् रुद्रको जो कुछ निवेदित किया है, वह सब आपकी कृपासे ही