गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
हुआ है। आपकी ही कृपासे यह व्रत भी आज समाप्त किया जा रहा है। श्रीमन्! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों। आप अपने लोकको अब प्रस्थान करें। आपका दर्शनमात्र प्राप्तकर मैं निस्संदेह पवित्र हो गया हूँ।
व्रती ध्याननिष्ठ ब्राह्मणको भोजनसे संतृप्त कर वस्त्र-छत्रादि दे। तदनन्तर वह पुनः इस प्रकार प्रार्थना करे—
देवादिदेव भूतेश लोकानुग्रहकारक॥
यन्मया श्रद्धया दत्तं प्रीयतां तेन मे प्रभुः।
(१२४। २०-२१)
हे देवादिदेव! समस्त प्राणिजगत्के स्वामिन्, संसारपर कृपा रखनेवाले प्रभो! श्रद्धापूर्वक मैंने जो कुछ आपको समर्पित किया है, उससे आप प्रसन्न हों।
इस प्रकार क्षमापन-स्तुति करनेके पश्चात् व्रतीको द्वादश-वार्षिक व्रतका संकल्प लेना चाहिये। ऐसा करके व्रती कीर्ति, लक्ष्मी, पुत्र तथा राज्यादिके सुख-वैभवको प्राप्तकर अन्तमें शिवलोकको प्राप्त करता है। व्रतधारी बारहों मासमें भी इस व्रतके जागरणको पूर्ण करके यदि द्वादश ब्राह्मणोंको भोजन प्रदान करे और दीपदान करे तो उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है।
(अध्याय १२४)
एकादशीमाहात्म्य
पितामहने कहा— मान्धाता नामके एक राजा थे, जिन्होंने एकादशीव्रत करके उसके पुण्यसे चक्रवर्ती सम्राट्की उपाधि धारण की थी। अतः कृष्ण एवं शुक्ल दोनों पक्षकी एकादशी तिथिमें मनुष्यको भोजन नहीं करना चाहिये।
गान्धारीने दशमीविद्धा एकादशीका व्रत किया था, जिसके फलस्वरूप उसके सौ पुत्रोंका विनाश उसके जीवनकालमें ही हो गया था। इसलिये दशमीसे युक्त एकादशीका व्रत नहीं करना चाहिये। द्वादशीके साथ एकादशी होनेपर उस एकादशीमें भगवान् हरिका संनिधान रहता है। जिस मास दशमीवेधसे युक्त एकादशी होती है, उसमें असुरोंका संनिधान होता है। जब विभिन्न शास्त्रोंमें कहे गये वाक्योंकी बहुलतासे अज्ञातावश संदेह बढ़ जाता है तो उस परिस्थितिमें द्वादशी तिथिको व्रत करके त्रयोदशी तिथिमें पारणा कर लेनी चाहिये।* यदि एकादशी एक कलामात्र भी कालगणनामें रहती है तो द्वादशी (युक्त एकादशी) तिथिको यह व्रत उपास्य है। यदि एकादशी, द्वादशी और विशेष रूपसे त्रयोदशी तिथि भी एक ही दिन आ जाती है तो इन तीन तिथियोंसे मिश्रित वह तिथि व्रत करने योग्य होती है, क्योंकि वह तिथि माङ्गलिक एवं सभी पापोंका विनाश करनेमें समर्थ होती है।
हे द्विजराज! एकादशी अथवा द्वादशीका व्रत करके तीन तिथियोंसे मिश्रित अर्थात् एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी तिथिसे समन्वित तिथिपर व्रत कर लेना उचित है, किंतु दशमीवेधसे युक्त एकादशीका व्रत कभी नहीं करना चाहिये।
रातमें जागरण तथा पुराणका श्रवण एवं गदाधर विष्णुकी पूजा करते हुए दोनों पक्षोंकी एकादशीका व्रत कर महाराज रुक्माङ्गदने मोक्ष प्राप्त किया था। अन्य एकादशी व्रतकर्ताओंने भी मोक्ष प्राप्त किया है।
(अध्याय १२५)
* यहाँ केवल वैष्णव एकादशीकी चर्चा की गयी है।