गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
श्रावणमासके शुक्लपक्षमें पञ्चमीको द्वारके दोनों ओर इन नागोंका चित्र बनाकर पूजन करना चाहिये। इसी दिन अनन्त आदि महानागोंकी पूजा करके नैवेद्यमें दूध तथा घी देना चाहिये, इससे सभी विषदोष दूर हो जाते हैं। नाग अभय वरदान देनेवाले होते हैं और यह पञ्चमी सर्पदंष्ट्री प्राणीको मुक्ति देनेवाली होती हैं। इसलिये दंष्ट्रोद्धार पञ्चमी कहलाती है। (अध्याय १२९)
षष्ठी तथा सप्तमीके विविध व्रत
ब्रह्माजीने कहा— भाद्रपदमासमें भगवान् कार्तिकेयकी पूजा करनी चाहिये<sup>१</sup>। इसमें स्नानादि जो कृत्य किये जाते हैं, वे सभी अक्षय फल प्रदान करनेवाले हो जाते हैं।
व्रती (षष्ठी तिथिको उपवासकर) सप्तमी तिथिको ब्राह्मणभोजन कराकर 'ॐ खखोल्काय नमः' इस मन्त्रसे सूर्यदेवकी पूजा करे और अष्टमी तिथिको मरिचका भोजनकर पारणा करे। इससे व्रती अन्तमें स्वर्ग प्राप्त करता है। मरिच-प्राशनके कारण इस व्रतका नाम मरिचसप्तमी है। इस व्रतको करनेसे प्रियजनोंसे मिलन होता है, उनसे वियोग नहीं होता। सप्तमी तिथिको संयमपूर्वक स्नानादि करके सूर्यकी पूजा करे। 'मार्तण्डः प्रीयताम्'— 'सूर्यदेव मुझपर प्रसन्न हों' यह कहते हुए ब्राह्मणोंके लिये फलोंका दान करे और खजूर, नारियल, बिजौरा नींबू आदि फलोंको प्रदान करे। यह प्रार्थना करे कि हे देव! मेरे सभी अभीष्ट चारों ओरसे सफल हों। फलदान एवं प्राशनके कारण इस सप्तमीका नाम 'फलसप्तमीव्रत' है।
सप्तमीको सूर्यदेवकी पूजा कर यदि ब्राह्मणोंको दक्षिणासहित पायसका भोजन कराया जाय, तदनन्तर व्रती स्वयं पयका पानकर व्रत समाप्त करे तो पुण्य-लाभ होता है। ओदन, भक्ष्य, चोष्य और लेह्य पदार्थ इस व्रतमें ग्राह्य नहीं है। धन-पुत्रकी कामना करनेवाला ओदनका परित्याग कर इस व्रतको करे। इसी वैशिष्ट्यके कारण इसे अनौदक सप्तमी कहा गया है।
विजयकी कामना करनेवालेको वायुमात्र पान कर विजयसप्तमीव्रत करना चाहिये। जो कामेच्छुक हैं, वे मात्र अर्कका प्राशनकर इस व्रतको करें। इस प्रकार व्रतकर वे कामपर विजय प्राप्त कर लेते हैं।
इस सप्तमीव्रतमें गेहूँ, उड़द, यव, साठी धान, तिल, कांस्यपात्र, पाषाणपात्र, पिसी हुई वस्तु, मधु, मैथुन, मद्य, मांस, तैल-मर्दन और अञ्जन त्याज्य है। जो मनुष्य इनका परित्याग कर व्रत करता है, उसकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इसीलिये इसे विजयसप्तमी कहा गया है। (अध्याय १३०)
दूर्वाष्टमी तथा श्रीकृष्णमाष्टमीव्रत
ब्रह्माजीने कहा—हे ब्रह्मन्! भाद्रपदमासमें शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको दूर्वाष्टमीव्रत होता है। इस दिन उपवास रहकर दूर्वासे गौरी-गणेशकी और शिवकी फल-पुष्प आदिसे पूजा करनी चाहिये। फल, धान्य आदि सभी प्रयोज्य वस्तुओंसे 'शम्भवे नमः, शिवाय नमः' कहकर शिवका पूजन करे। तदनन्तर 'त्वं दूर्वेऽमृतजन्मासि<sup>२</sup> इस मन्त्रसे दूर्वाकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे
१- कार्तिकेयकी तिथि षष्ठी कही गयी है।
२- त्वं दूर्वेऽमृतजन्मासि वन्दिता च सुरासुरैः। सौभाग्यं संततिं कृत्वा सर्वकार्यकरी भव॥
यथा शाखाप्रशाखाभिर्विस्तृतासि महीतले। तथा ममापि संतानं देहि त्वमजरामरे॥