गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] दूर्वाष्टमी तथा श्रीकृष्णजन्माष्टमीव्रत २३१
यह अष्टमीव्रत निश्चित ही साधकको सर्वस्व प्रदान कर देता है। इस व्रतमें जो अग्निमें न पकाये गये पदार्थोंका भोजन करता है, वह ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है।
इसी भाद्रपदके कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको अर्द्धरात्रिमें रोहिणीनक्षत्रमें भगवान् हरिकी पूजाका विधान है। यह श्रीकृष्णजन्माष्टमीव्रत कहलाता है। सप्तमी तिथिसे विद्ध अष्टमी तिथि भी व्रतके योग्य होती है। इस प्रकारके अष्टमीका व्रत करनेसे प्राणीके तीन जन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं। अतः उपवास रखकर मन्त्रसे भगवान् हरिकी पूजा करके तिथि और नक्षत्रके अन्तमें पारणा करनी चाहिये।
‘ॐ योगाय योगपतये योगेश्वराय योगसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’ इस मन्त्रसे योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान कर ‘ॐ यज्ञाय यज्ञेश्वराय यज्ञपतये यज्ञसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’ इस मन्त्रसे उन्हें स्नान कराना चाहिये।
उसके बाद ‘ॐ विश्वाय विश्वेश्वराय विश्वपतये विश्वसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः’ इस मन्त्रसे श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात्—‘ॐ सर्वाय सर्वेश्वराय सर्वपतये सर्वसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’ इस मन्त्रसे उन्हें शयन कराना चाहिये।
स्थण्डिल (वेदी)-में चन्द्रमा और रोहिणीके साथ भगवान् कृष्णकी पूजा करे। पुष्प, फल और चन्दनसे युक्त जलको शंखमें लेकर अपने दोनों घुटनोंको पृथिवीसे लगाते हुए चन्द्रमाको निम्न मन्त्रद्वारा अर्घ्य प्रदान करे—
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव॥
गृहाणार्घ्यं शशाङ्केश रोहिण्या सहितो मम।
(१३१।८-९)
हे क्षीरसागरसे उत्पन्न देव! हे अत्रिमुनिके नेत्रसे समुद्भूत! हे चन्द्रदेव! रोहिणीदेवीके साथ मेरे द्वारा प्रदत्त इस अर्घ्यको आप स्वीकार करें।
तदनन्तर व्रतीको महालक्ष्मी, वसुदेव, नन्द, बलराम तथा यशोदाको फलयुक्त अर्घ्य प्रदानकर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
अनन्तं वामनं शौरिं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम्॥
वासुदेवं हृषीकेशं माधवं मधुसूदनम्।
वराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं दैत्यसूदनम्॥
दामोदरं पद्मनाभं केशवं गरुडध्वजम्।
गोविन्दमच्युतं देवमनन्तमपराजितम्॥
अधोक्षजं जगद्बीजं सर्गस्थित्यन्तकारणम्।
अनादिनिधनं विष्णुं त्रिलोकेशं त्रिविक्रमम्॥
नारायणं चतुर्बाहुं शङ्खचक्रगदाधरम्।
पीताम्बरधरं दिव्यं वनमालाविभूषितम्॥
श्रीवत्साङ्कं जगद्धाम श्रीपतिं श्रीधरं हरिम्।
यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत्॥
भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै तस्मै ब्रह्मात्मने नमः।
(१३१।१०-१६)
वे देव जो अनन्त, वामन, शौरि, वैकुण्ठनाथ, पुरुषोत्तम, वासुदेव, हृषीकेश, माधव, मधुसूदन, वराह, पुण्डरीकाक्ष, नृसिंह, दैत्यसूदन, दामोदर, पद्मनाभ, केशव, गरुडध्वज, गोविन्द, अच्युत, अनन्तदेव, अपराजित, अधोक्षज, जगद्बीज, सर्गस्थित्यन्तकारण, अनादिनिधन, विष्णु, त्रिलोकेश, त्रिविक्रम, नारायण, चतुर्भुज, शङ्खचक्रगदाधर, पीताम्बरधारी, दिव्य, वनमालासे विभूषित, श्रीवत्साङ्क, जगद्धाम, श्रीपति और श्रीधरादि नामसे प्रसिद्ध हैं, जिनको देवकीसे वसुदेवने उत्पन्न किया है, जो पृथिवीपर निवास करनेवाले ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये संसारमें अवतरित होते हैं, उन ब्रह्मरूप भगवान् श्रीकृष्णको मैं नमन करता हूँ।
इस प्रकार भगवान्के नामोंका संकीर्तन करके अपनी सद्गतिके लिये पुनः यह प्रार्थना करनी चाहिये—
त्राहि मां देवदेवेश हरे संसारसागरात्।
त्राहि मां सर्वपापघ्न दुःखशोकार्णवात् प्रभो॥