गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| काण्ड ] | भगवान्के विभिन्न अवतारोंकी कथा तथा पतिव्रता-माहात्म्य | २४५ |
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मन्थनके समय अमृतसे परिपूर्ण कमण्डलुको लिये हुए धन्वन्तरि वैद्यके रूपमें समुद्रसे वे ही प्रकट हुए। उन्हींके द्वारा सुश्रुतको अष्टाङ्ग आयुर्वेदकी शिक्षा दी गयी थी। उन श्रीहरिने स्त्री (मोहिनी)-का रूप धारण करके देवोंको अमृतका पान कराया।
वराहका अवतार लेकर उन्होंने हिरण्याक्षको मारा। उसके अधिकारसे पृथिवीको छीनकर पुनः स्थापित किया और देवताओंकी रक्षा की। तदनन्तर नरसिंहरूपमें इन्होंने हिरण्यकशिपु तथा अन्य दैत्योंका विनाशकर वैदिकधर्मका पालन किया। तत्पश्चात् इस सम्पूर्ण संसारके स्वामी उन विष्णुने जमदग्निसे परशुरामका अवतार लेकर इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियजातिसे रहित किया था।<sup>१</sup> कृतवीर्यके पुत्र कार्तवीर्य सहस्रार्जुनको युद्धमें मार करके इन्हीं भगवान् परशुरामने यज्ञानुष्ठानमें उसके सम्पूर्ण राज्यका आधिपत्य महर्षि कश्यपको सौंप दिया और स्वयं महाबाहु (परशुराम) महेन्द्रगिरिपर जाकर तपमें स्थित हो गये।
इसके बाद दुष्टोंका मर्दन करनेवाले भगवान् विष्णु राम आदि चार स्वरूपोंमें राजा दशरथके पुत्रके रूपमें अवतीर्ण हुए। जिनके नाम राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न हैं। रामकी पत्नी जानकी हुईं। पिताके वचनको सत्य करनेके लिये तथा माता (कैकेयी)-के हितकी रक्षा करते हुए रामने अयोध्याका राजवैभव त्यागकर शृंगवेरपुर, चित्रकूट तथा दण्डकारण्यमें निवास किया। तदनन्तर वहींपर शूर्पणखाकी नाक कटवाकर उसके भाई खर तथा दूषण नामक दो राक्षसोंको मारा। तत्पश्चात् जानकीका अपहरण करनेवाले दैत्याधिपति रावणका वधकर उसके छोटे भाई विभीषणको लङ्कापुरीमें राक्षसोंके राजाके रूपमें अभिषिक्त किया। उसके बाद अपने मुख्य सहयोगी सुग्रीव तथा हनुमानादिके साथ पुष्पक विमानपर आरूढ़ होकर पतिपरायणा सीता एवं लक्ष्मणके साथ वे अपनी पुरी अयोध्या आ गये। यहाँ उन्होंने राज्यसिंहासन प्राप्तकर देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों तथा प्रजाका पालन किया।
उन्होंने धर्मकी भलीभाँति रक्षा की। अश्वमेधादि अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया। भगवती सीताने राजा रामके साथ सुखपूर्वक रमण किया। यद्यपि सीता रावणके घरमें रहीं, फिर भी उन्होंने रावणको अंगीकार नहीं किया और सर्वदा मन, वचन तथा कर्मसे राममें ही अनुरक्त रहीं। वे सीता तो अनसूयाके समान पतिव्रता थीं।
**ब्रह्माजीने पुनः कहा—**अब मैं पतिव्रता स्त्रीका माहात्म्य कह रहा हूँ, आप सुनें।
पुराने समयमें प्रतिष्ठानपुरमें कौशिक नामका एक कुष्ठरोगी ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मणकी पत्नी अपने पतिकी देवताके समान ही सेवा-शुश्रूषा करती थी। पतिके द्वारा तिरस्कार मिलनेपर भी वह पतिव्रता पतिको देवता-रूप ही मानती थी। एक बार पतिके द्वारा कहे जानेपर वेश्याको शुल्क देनेके लिये अधिकतम धन साथ लेकर वह उन्हें कन्धेपर बैठाकर वेश्याके घर पहुँचाने निकल पड़ी।
मार्गमें माण्डव्य ऋषि थे। यद्यपि वे ऋषि परम तपस्वी महात्मा थे, तथापि उन्हें चोर समझकर राजदण्डके रूपमें लोहेके लम्बे शङ्कुपर बिठा दिया गया था। अतः शरीरके नीचेके छिद्रसे ऊपर सिरके छिद्र ब्रह्मरन्ध्रतक शरीरके भीतर-ही-भीतर लौह शङ्कुके प्रवेशके कारण माण्डव्य ऋषिका असह्य तीव्र वेदनासे ग्रस्त होना स्वाभाविक
१. यहाँ क्षत्रिय जातिसे रहित करनेका तात्पर्य इतना ही है कि श्रीपरशुरामने क्षत्रियोंके दर्पका मर्दन किया और उनकी कर्तव्यविमुखताको नष्ट किया।