गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ज्वर-निदान
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जायगा। सभी रोगोंके मूल कारण [शरीरमें स्थित] कुपित दोष ही हैं। किंतु दोष-प्रकोपका भी कारण अनेक प्रकारके अहितकर पदार्थोंका सेवन है। यह अहितसेवन तीन प्रकार (असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध तथा परिणाम)-का होता है, इन तीनों योगोंको पहले बताया जा चुका है।
वात-प्रकोपका निदान
तिक्त, उष्ण, कटु, कषाय, अम्ल और रूक्ष खाद्यान्नका असंयमित आहार, दौड़ना, जोरसे बोलना, रात्रि-जागरण तथा उच्च भाषण, कार्योंमें विशेष अनुरक्ति, भय, शोक, चिन्ता, व्यायाम एवं मैथुन करनेसे शरीरके अन्तर्गत विद्यमान वायु प्रकुपित हो जाती है। विशेषतः यह वायु-विकार ग्रीष्म-ऋतुके दिन तथा रात्रिमें भोजन करनेके पश्चात् पाकके अन्तमें होता है।
पित्त-प्रकोपका निदान
कटु, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण, लवण तथा क्रोधोत्पादक एवं दाहोत्पादक आहार करनेसे पित्त प्रकुपित होता है। पित्तका यह प्रकोप शरद्-ऋतुके मध्याह्न, अर्धरात्रि तथा अन्य दाह उत्पन्न करनेवाले क्षणोंमें विशेषरूपसे होता है।
कफ-प्रकोपका निदान
मधुर<sup>१</sup>, अम्ल, लवण, स्निग्ध, गुरु, अभिष्यन्दी तथा शीतल भोजनोंके प्रयोगसे, बैठे रहनेसे, निद्रासे, सुख-भोगसे, अजीर्णसे, दिवा-शयनसे, अत्यन्त बलकारक पदार्थोंके प्रयोगसे, वमन आदि न करनेसे, भोजनके परिपाकके प्रारम्भकालमें, दिनके प्रथम भागमें तथा रात्रिके प्रथम भागमें कफ कुपित होता है और दो-दो दोषोंके प्रकोपक आहार-विहारका सेवन करनेसे दो-दो दोष प्रकुपित होते हैं।
त्रिदोष-प्रकोपका निदान एवं सब रोगोंकी सामान्य सम्प्राप्ति
त्रिदोषके (वात-पित्त<sup>२</sup> तथा श्लेष्मा—इन सभीके) प्रकुपित तथा मिश्रित स्वभावसे सन्निपातकी उत्पत्ति होती है। संकीर्ण भोजन, अजीर्णतामें भोजन, विषम तथा विरुद्ध भोजन, मद्यपान, सूखे शाक, कच्ची मूली, पिण्याक (खली), मृत्युवत्सर पूति (सत्तू) शुष्क, कृशा, मांस तथा मत्स्यादिका भक्षण करनेसे, वात-पित्त एवं श्लेष्मोत्पादक विभिन्न पदार्थोंके उपभोगसे, आहार्य अन्नका परिवर्तन, धातुजन्य-दोष, वात-पित्त, श्लेष्माका परस्पर मिलकर उपद्रव करनेसे शरीरमें यह विकार (सन्निपात) उत्पन्न होता है। दूषित कच्चे अन्नका प्रयोग करनेसे, श्लेष्माजनित विकारसे तथा ग्रहोंके प्रभावसे, मिथ्या आहार-व्यवहारके योगसे, पूर्वजन्ममें संचित विभिन्न पापोंके प्रभाववश किये गये दुराचरणसे, स्त्रियोंमें प्रसव-कालकी विषमता तथा मिथ्योपचारसे शरीरमें सन्निपातकी विकृति उत्पन्न होती है। इस प्रकार प्रकुपित वात आदि दोष रोगोंके अधिष्ठानोंमें जानेवाली रसवाहिनियोंके द्वारा शरीरमें पहुँचकर अनेक प्रकारके विकारोंको उत्पन्न करते हैं।
(अध्याय १४६)
ज्वर-निदान
**धन्वन्तरिजीने कहा—**हे सुश्रुत! अब समस्त ज्वरोंकी<sup>३</sup> विशेष जानकारीके लिये मैं ज्वर-निदानको बताऊँगा।
ज्वर रोगपति, पाप्मा, मृत्युराज, ओजोऽशन (ओजको खा जानेवाला), अन्तक (आयुको समाप्त कर देनेवाला), क्रुद्ध होकर दक्षके यज्ञको विध्वंस
१-अ०हृ०अ० २। १७-१८।
२-अ०हृ०नि०अ० २। १९–२३ (चिकित्सादर्श परि० पृ० ९ वैद्य राजेश्वरशास्त्रीकृत)।
३-अ०हृ०नि०अ०२, माधव ज्वर नि०पृ० ७३।