भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२५४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

करनेवाले रुद्रके तीसरे नयनसे उत्पन्न संताप, मोहमय, संतापात्मा तथा अपचारज (मिथ्या आहार-विहारसे उत्पन्न)—इन विभिन्न नामोंसे नाना प्रकारकी योनियोंमें विद्यमान रहता है।

यह हाथियोंमें पाकल, अश्वोंमें अभिताप, कुत्तोंमें अलर्क, मेघोंमें इन्द्रमद, जलमें नीलिका, औषधियोंमें ज्योति और भूखण्डोंमें ऊषर नामसे रहता है।

कफ-ज्वरके लक्षण

कफसे<sup></sup> उत्पन्न होनेवाले ज्वरमें हृदयमें घबराहट, वमन, खाँसी, शरीरमें ठंडक तथा अङ्गोंमें सूजन हो जाती है। दोषोंके प्रकोप-कालमें ज्वरकी उत्पत्ति होने लगती है। (पर यह पहलेसे जो उत्पन्न हो चुके हैं) बढ़ावपर आ जाते हैं (ग्रन्थकारका अभिप्राय यह है कि चिकित्सक इस स्थितिसे लाभ उठायें)। पहले वह कालपर विचार करें कि यह वात, पित्त, कफ—इन दोषोंमें किस दोषको प्रकुपित करनेवाला है। इस आधारपर रोगको समझनेमें सुविधा हो सकती है। जिस तरह विशिष्ट कालके द्वारा रोगकी उत्पत्ति या वृद्धि देखकर यह रोग—वात आदि किस दोषसे उत्पन्न हुआ है, यह अनुमान कर लिया जाता है, उसी तरह उपशय (लाभ) और अनुपशय (हानि)-से भी रोगको पहचाना जा सकता है। औषध, अन्न, विहार, देश, काल आदिसे उत्पन्न लाभको उपशय कहते हैं और इन्हीं औषध आदिका उपयोग यदि किसी रोगमें दुःखद हो तो उसे अनुपशय कहते हैं।

अतः किस प्रकारकी औषधि, अन्न आदिके सेवनसे रोगीको लाभ (उपशय) हो रहा है और किस प्रकारकी औषधि आदिसे हानि (अनुपशय) हो रहा है, इसपर विचार करनेसे चिकित्सकको रोग समझनेमें आसानी होती है।

निदान-प्रकरणमें कहे गये (किस औषधि और विहारके सेवनसे) अनुपशय (हानि) होती है और किन पदार्थोंके सेवनसे उपशय (लाभ) होता है, यह देखकर दोषोंका अनुमान किया जा सकता है। अरुचि, अपरिपाक, स्तम्भ, आलस्य, हृदयदाह, विपाक, तन्द्रा, वस्ति, विमर्दावनय, लारका गिरना, मनका भरा होना, भूखका न लगना, मुखकी चिपचिपाहट, शरीरमें श्वेतता होना, उष्णताका रहना, शरीरका भारी लगना, अधिक पेशाबका होना, शरीरकी जीर्णताका विशेष भान होना तथा शरीरकी कान्तिमें मलिनताका आना—ये सभी आम ज्वरके लक्षण हैं।

भूखका न लगना, शरीरका हलका हो जाना, यह सामान्य ज्वर है। जब ज्वरमें वात-पित्त तथा कफ—तीनों दोष बराबर बढ़ते रहते हैं तो उसे परिपक्व अष्टाह<sup></sup> (निराम) ज्वरका लक्षण माना जाता है। दो दोषोंके लक्षणोंका संसर्ग होनेपर तीन संसर्गज-द्वन्द्वज<sup></sup> ज्वर होते हैं।

वात-पित्त-ज्वरके लक्षण

सिरमें वेदना, मूर्च्छा, वमन, शरीर-प्रदाह, मोह, कण्ठ और मुखकी शुष्कता, अरुचि, शरीरके पर्व-पर्वमें टूटन, अनिद्रा, मनमें विभ्रम, रोमाञ्च (सिहरन), जम्हाई एवं वात-प्रकोपसे त्वचामें शीतलताकी अनुभूतिका होना—ये सभी लक्षण वात और पित्तकी प्रवृत्तिके कारण उत्पन्न हुए ज्वरसे ग्रसित शरीरमें दिखायी देते हैं।

ज्वर-तापकी अल्पता, अरुचि, पर्ववेदना (शरीरके प्रत्येक जोड़में दर्द), सिरपीड़ा, बार-बार थूकनेकी इच्छा, श्वास-कष्ट और खाँसी, चेहरेका रंग उड़ जाना, ठंडक लगना, आँखोंके सामने दिनमें भी अन्धकारका छाया रहना और अनिद्राका होना—ये सभी लक्षण कफ-वातजनित ज्वरकी पहचान कराते हैं।


१-कफ-ज्वरके लक्षण, अ०हृ०अ० २।२२ । २-निरामज्वरका लक्षण (च०चि०अ० ३)। ३-द्वन्द्वज ज्वरका रूप अ०हृ० अ० २।२३-२६।

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