गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] ज्वर-निदान २५५
शरीरमें अनियत शीतलताका अनुभव, स्तम्भन, पसीनेका आना, दाहका होना, प्यासका लगना और खाँसीका आना, श्लेष्म एवं पित्तकी प्रवृत्ति, मूर्च्छा, तन्द्रावस्थामें तथा मुखमें कडुवापनका होना—ये सभी लक्षण श्लेष्म-पित्तजन्य ज्वरके रूपका निर्धारण करते हैं।
वात<sup>१</sup>-पित्त और श्लेष्म-प्रवृत्तिजन्य सभी लक्षणोंके एक साथ सर्वज (सन्निपात) ज्वरका आकलन होता है। ऐसी अवस्थामें बार-बार ये सभी लक्षण प्रकट होते रहते हैं। इस ज्वरकालमें रोगीको ठंडक लगती है, दिनमें महानिद्राकी स्थिति बनी रहती है, रात्रिमें नींद नहीं आती या सदैव निद्रा ही रहती है अथवा निद्रा ही नहीं आती। रोगीको अधिक पसीना छूटता है अथवा पसीना ही नहीं आता। वह ऐसी अवस्थामें गीत गाता है, नाचता है या हास्यादिकी क्रियाओंको करता है। उसकी सामान्य प्रकृति पूर्ण बदली हुई होती है। नेत्र मलिन एवं आँसुओंसे डबडबाये रहते हैं। आँखोंकी पलकोंके किनारोंपर लाली छायी रहती है और आँखें खुली रहती हैं अथवा मुँदी रहती हैं। शरीरकी पिण्डुली, पार्श्वभाग, सिर, संधि-स्थान तथा हड्डी-हड्डीमें वेदना होती है और बुद्धिमें भ्रम बना रहता है। दोनों कान ध्वनि एवं वेदनासे व्याप्त रहते हैं। ये अत्यधिक ठंडे हो जाते हैं अथवा अत्यधिक गर्म हो जाते हैं। रोगीकी जिह्वा जली हुई-सी प्रतीत होती है अर्थात् कुछ लाल और कृष्ण वर्णके मिश्रित भावोंसे युक्त तथा खुरदरी हो जाती है, उसमें स्निग्धता नहीं रह जाती। सम्पूर्ण शरीर एवं उसके संधि-स्थानोंमें भारीपन तथा शिथिलता आ जाती है।
रोगीके मुखसे रक्त-पित्तमिश्रित थूक निकलता है, सिर लुढ़क जाता है, अत्यन्त प्यास लगती है। शरीरके समस्त कोष्ठ-प्रदेशोंका वर्ण श्याम और रक्त हो जाता है। उनपर मण्डलाकार धब्बे दिखायी पड़ने लगते हैं। हृदयमें व्यथा होने लगती है। आँख, कान, नाक, गुदा आदिसे निकलनेवाले मलकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है अथवा अत्यन्त कम हो जाती है। मुखमें स्निग्धता, बलकी क्षीणता, स्वरभंग, ओजक्षय तथा प्रलापकी स्थिति उत्पन्न होने लगती है। दोषपाक अर्थात् वात-पित्त और कफकी वृद्धि शरीरके अंदर-ही-अंदर पक जाती है, जिससे शरीरकी सामान्य गतिमें अवरोध आ जाता है, कण्ठ घरघराने लगता है। शरीरमें तन्द्राकी अवस्था रहती है और कण्ठसे अव्यक्त शब्द निकलने लगते हैं। ऐसे लक्षणोंसे युक्त रोग शरीरमें अपना स्थान बना लेता है, उसको बलवीर्य-विनाशक अभिन्यास-सन्निपात<sup>२</sup> नामक ज्वर कहना चाहिये।
इस सन्निपातिक ज्वरमें वायु-विकारके कारण कण्ठमें अवरोध उत्पन्न होनेसे पित्त आभ्यन्तर-भागमें पीड़ा पहुँचाने लगता है और (विशेष मार्ग) नाक आदिसे सुखपूर्वक बिना प्रयासके ही बाहर निकलने लगता है। उसी पित्त-प्रभावके कारण नेत्र हल्दीके समान पीले पड़ जाते हैं। वात-पित्त तथा कफजन्य दोषके बढ़ जानेपर जब शरीरमें विद्यमान अग्नि-तत्त्व विनष्ट हो जाता है तो उस समय वह अपने सम्पूर्ण लक्षणोंसे युक्त रहता है। यह सन्निपात-ज्वर असाध्य है। इसपर बड़ी ही कठिनतासे अधिकार प्राप्त किया जा सकता है।
इस सन्निपात<sup>३</sup>का एक अन्य भी रूप है, जिसमें पित्त पृथक्-भावसे स्थित रहता है। ऐसे ज्वरमें त्वचा और कोष्ठके अंदर दाह होता है अथवा यह स्थिति इस ज्वरोत्पत्तिके पहले भी शरीरमें हो सकती है। उसी प्रकार जब वात और पित्तकी
१-त्रिदोषजज्वरका रूप अ०हृ०अ० २। २७-३३। २-वेगसेन अभिन्यास ज्वर-प्रकरण देखें। ३-चरक चि०अ० ३, सु०उ०अ० ३९।