भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] नवव्यूहार्चनविधि, पूजानुक्रम-निरूपण २७


नवव्यूहार्चनविधि, पूजानुक्रम-निरूपण

श्रीहरिने (रुद्रसे) कहा—(गरुड़ने) कश्यप ऋषिको जो नवव्यूहकी पूजाका वर्णन सुनाया था, उसको (अब) मैं कह रहा हूँ, आप सुनें।

साधक सबसे पहले [योग-क्रियाके द्वारा] जीवात्माको मस्तक, नाभि और [हृदयरूपी] आकाश नामक तत्त्वमें प्रविष्ट करे। तदनन्तर वह 'रं' (इस अग्निबीज) मन्त्रसे पाञ्चभौतिक शरीरका शोधन करे। उसके बाद वह 'यं' (इस वायु) बीजमन्त्रसे उस सम्पूर्ण शरीरके लयकी भावना करे। तत्पश्चात् वह 'लं' इस बीजमन्त्रसे चराचर जगत्-(के साथ उस विलीन हुए शरीर)-के सम्प्लावित होनेकी भावना करे। उसके बाद वह 'वं' इस बीजमन्त्रसे पुनः स्वयंमें अमरत्वकी भावना करे। तदनन्तर [अमृतके] बुद्बुदोंके बीच 'मैं ही पीताम्बरधारी चतुर्भुज भगवान् श्रीहरि हूँ' ऐसा मानकर आत्मतत्त्वके ध्यानमें निमग्न हो जाय।

इसके बाद शरीर तथा हाथमें तीन प्रकारका मन्त्र-न्यास करना चाहिये। पहले द्वादशाक्षर बीजमन्त्रसे, तदनन्तर कहे गये बीजमन्त्रसे न्यास और बादमें षडङ्गन्यास करे। इससे साधक साक्षात् नारायणस्वरूप हो जाता है। साधक दक्षिण अङ्गुष्ठसे प्रारम्भकर मध्यमा अङ्गुलिपर्यन्त न्यास करे। उसके बाद वह पुनः मध्य अङ्गुलिपर ही दो बीजमन्त्रसे न्यास करके पुनः शरीरके विभिन्न अङ्गोंपर न्यास करे। क्रमशः हृदय, सिर, शिखा, कवच, मुख, नेत्र, उदर और पीठ-भागसे अङ्गन्यास करते हुए दोनों बाहु, दोनों हाथ, दोनों जानु और दोनों पैरोंमें भी न्यास करना चाहिये।

तदनन्तर अपने दोनों हाथोंको कमलवत् आकृति प्रदान करके उसके मध्य-भागमें दोनों अङ्गुष्ठोंको संनिविष्ट करे। तत्पश्चात् उसी मुद्राकृतिमें परमतत्त्वस्वरूप, अनामय, सर्वेश्वर भगवान् नारायणका चिन्तन करे।

इसके बाद इन्हीं बीजमन्त्रोंसे क्रमशः तर्जनी आदि अङ्गुलियोंमें न्यास करके यथाक्रम सिर, नेत्र, मुख, कण्ठ, हृदय, नाभि, गुह्य, जानुद्वय तथा पादद्वयमें भी न्यास करना चाहिये।

बीजमन्त्रोंसे दोनों हाथोंमें न्यास तथा षडङ्गन्यास करके सम्पूर्ण शरीरमें न्यास करना चाहिये। वह अङ्गुष्ठसे कनिष्ठा अङ्गुलितक पाँच बीजमन्त्रोंसे न्यास करे। उसके बाद हाथके मध्य-भागमें नेत्रके बीजमन्त्रसे न्यास करनेका विधान है। अङ्गन्यासमें भी इसी क्रमसे हृदय-भागमें हृदय, मस्तकमें मस्तक, शिखामें शिखा, दोनों स्तन-प्रदेशमें कवच, नेत्रद्वयमें नेत्र तथा दोनों हाथोंमें अस्त्र-बीजमन्त्रको अवस्थित करना चाहिये।

तदनन्तर उन्हीं बीजमन्त्रोंसे दिशाओंको प्रतिबद्ध करके साधक पूजनकी क्रिया प्रारम्भ करे। सबसे पहले एकाग्रचित्त होकर उसको अपने हृदयमें योगपीठका ध्यान करना चाहिये। उसके बाद वह आग्नेयादिसे पूर्व दिशाओंमें यथाक्रम धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यको विन्यस्त करके पूर्वादि दिशाओंमें अधर्मादिका न्यास करे। यथा— अग्निकोणमें 'ॐ धर्माय नमः', नैर्ऋत्यकोणमें 'ॐ ज्ञानाय नमः', वायुकोणमें 'ॐ वैराग्याय नमः' और ईशानकोणमें 'ॐ ऐश्वर्याय नमः', पूर्व दिशामें 'ॐ अधर्माय नमः', दक्षिण दिशामें 'ॐ अज्ञानाय नमः', पश्चिम दिशामें 'ॐ अवैराग्याय नमः' तथा उत्तर दिशामें 'ॐ अनैश्वर्याय नमः' कहकर न्यास करे।

साधक इस प्रकार इन न्यास-विधियोंसे आच्छादित अपने शरीरको आराध्यका पीठ और स्वयंको उसीका स्वरूप समझकर पूर्वाभिमुख