भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

उन्नत अवस्थामें स्थिर होकर अनन्त भगवान् विष्णुको अपनेमें प्रतिष्ठित करे। तदनन्तर ज्ञानरूपी सरोवरमें उत्पन्न ऊपरकी ओर उठी हुई कर्णिकासे युक्त शतपत्रवाले आठों दिशाओंमें प्रसरित श्वेत अष्टदल-कमलका ध्यान करे।

तत्पश्चात् साधकको ऋग्वेदादिके मन्त्रोंसे सूर्य, चन्द्र तथा अग्निस্বরূপ मण्डलोंका क्रमशः एकके ऊपर एकका ध्यान करना चाहिये। उसके बाद वह पूर्वादि दिशाओंमें भगवान् केशवके पास ही अवस्थित विमलादि शक्तियोंको अष्टदल-कमलपर विन्यस्त करके नवीं शक्तिको कर्णिकामें स्थापित करे।

इस प्रकार ध्यान करके उस साधकको योगपीठकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् वह पुनः मनसे भगवान् विष्णुका अङ्गसहित आवाहनकर [उस योगपीठमें उन्हें] प्रतिष्ठित करे। तदनन्तर पूर्वादि चारों दिशाओंमें अवस्थित चतुर्दल-कमलपर हृदयादिन्यास करना चाहिये। कमलके मध्यभागमें तथा कोणोंपर अस्त्रमन्त्रका न्यास करे। अर्थात् उसके पूर्व दलमें 'हृदयाय नमः', दक्षिण दलमें 'शिरसे स्वाहा', पश्चिम दलमें 'शिखायै वषट्', उत्तर दलमें 'कवचाय हुम्', मध्यमें 'नेत्रत्रयाय वौषट्' तथा कोणमें 'अस्त्राय फट्' कहकर न्यास करना चाहिये।

तत्पश्चात् पूर्वादि दिशाओंमें यथाक्रम सङ्कर्षण आदिके बीजमन्त्रोंको विन्यस्त करनेका विधान है। तदनन्तर वह पूर्व और पश्चिम दिशाके द्वारपर 'ॐ वैनतेयाय नमः' कहकर वैनतेयको प्रतिष्ठित करे। उसके बाद दक्षिण द्वारपर 'ॐ सुदर्शनाय नमः', 'ॐ सहस्राराय नमः' का उच्चारण करके हजार अरोंवाले सुदर्शन चक्रकी वह स्थापना करे। तदनन्तर दक्षिण द्वारपर 'ॐ श्रियै नमः' मन्त्रसे श्रीका न्यास करके उत्तर द्वारपर 'ॐ लक्ष्म्यै नमः' मन्त्रसे लक्ष्मीको प्रतिष्ठित करे।

साधकको इसके बाद उत्तर दिशामें 'ॐ गदायै नमः' मन्त्रसे गदा, कोणोंमें 'ॐ शङ्खायै नमः' मन्त्रसे शङ्खका न्यास करना चाहिये।

तत्पश्चात् उन विष्णुदेवके दोनों ओर आयुधोंका न्यास करना चाहिये। विद्वान् साधक दक्षिणकी ओर शार्ङ्ग (धनुष) तथा देवके बायीं ओर इषु (बाणों)-का न्यास करे। इसी प्रकार दोनों भागोंमें खड्ग और चर्मका न्यास करे।

तदनन्तर वह साधक मण्डलके मध्य दिशाभेदके अनुसार पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि लोकपालोंको प्रतिष्ठित करे और उनके आयुधोंको भी स्थापित करे। उसके बाद विद्वान् साधकको ऊपरकी ओर 'ॐ ब्रह्मणे नमः' मन्त्रसे ब्रह्मा तथा नीचेकी ओर 'ॐ अनन्ताय नमः' मन्त्रसे अनन्तदेवका न्यास करना चाहिये।

इस प्रकार साधक सभी देवोंका न्यास एवं ध्यान करके उनकी पूजा करे और उनके सामने उनकी ही मुद्राका प्रदर्शन करे। अञ्जलिबद्ध होना प्रथम मुद्रा है। इसके प्रदर्शनसे शीघ्र ही देवसिद्धि हो जाती है। दूसरी वन्दिनी मुद्रा है और तीसरी मुद्रा हृदयासक्ता है। इस मुद्रामें बायें हाथकी मुट्ठीसे दाहिने हाथके अँगूठेको बाँधकर बायें हाथके अँगूठेको ऊपर उठाये हुए हृदयभागसे संलग्न रखना चाहिये। व्यूह-पूजामें मूर्तिभेदसे इन तीन मुद्राओंको साधारण मुद्रा माना गया है। दोनों हाथोंमें अँगूठेसे कनिष्ठापर्यन्त तीन अँगुलियोंको नवाकर क्रमशः उन्हें मुक्त करनेसे आठ मुद्राएँ बनती हैं।

दोनों हाथोंके अँगूठोंसे अपने-अपने हाथकी मध्यमा, अनामिका तथा कनिष्ठा अँगुलियोंको नीचेकी ओर झुकाकर जो मुद्रा बनायी जाती है, उसको 'नरसिंह-मुद्रा' कहते हैं। दाहिने हाथके ऊपर बायें हाथको उत्तान स्थितिमें रखकर प्रतिमाके