गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] पूजानुक्रम-निरूपण [ २९
ऊपर धीरे-धीरे घुमानेको 'वाराही मुद्रा' कहते हैं। भगवान् वाराहको सदा ही यह प्रिय है। दोनों मुट्ठियोंको उत्तान रखकर क्रमशः एक-एक अँगुली सीधे खोलते हुए सभीको खोल दे। तदनन्तर उन सभी अँगुलीयोंकी पुनः मुट्ठी बाँध ले। यह 'अङ्गमुद्रा' कहलाती है। साधकको इन मुद्राओंका प्रदर्शन क्रमशः दसों दिक्पालोंके लिये करना चाहिये।
भगवान् वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ देव-स्थानके अधिकारी देव हैं। साधकको—'ॐ अं वासुदेवाय नमः' मन्त्रसे वासुदेव, 'ॐ आं बलाय नमः' मन्त्रसे बलराम, 'ॐ अं प्रद्युम्नाय नमः' मन्त्रसे प्रद्युम्न तथा 'ॐ अः अनिरुद्धाय नमः' मन्त्रसे अनिरुद्धकी पूजा करनी चाहिये।
ॐकार, तत्सत्, हुं, क्षौं तथा भूः—ये पाँच क्रमशः नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नरसिंह और महावराहभगवान्के बीजमन्त्र हैं, इसलिये साधक—'ॐ नारायणाय नमः' मन्त्रसे भगवान् नारायण, 'ॐ तत्सद् ब्रह्मणे नमः' मन्त्रसे पद्मयोनि ब्रह्मा, 'ॐ हुं विष्णवे नमः' मन्त्रसे विष्णु, 'ॐ क्षौं नरसिंहाय नमः' मन्त्रसे नरसिंह तथा 'ॐ भूः महावराहाय नमः' मन्त्रसे आदिवराहका पूजन करे।
उपर्युक्त इन नौ देवताओं (वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नरसिंह तथा महावराह) (नवव्यूह)-का वर्ण क्रमशः श्वेत, अरुण, हरिद्रावत् पीत, नील, श्यामल, लोहित, मेघवत् श्याम, अग्निवत् पीत एवं मधु पिङ्गल है। अर्थात् वासुदेव श्वेत, बलदेव अरुण, प्रद्युम्न हरिद्रावत् पीत, अनिरुद्ध नील, नारायण श्याम, ब्रह्मा रक्ताभ, विष्णु मेघवत् श्याम, नरसिंह अग्निवत् पीत तथा वराहदेव मधु पिङ्गल वर्णकी तेजस्वी आभासे सुशोभित रहते हैं।
'(ॐ) कं टं पं शं' बीजमन्त्रसे गरुड, '(ॐ) जं खं वं' बीजमन्त्रसे सुदर्शन, '(ॐ) षं चं फं षं' बीजमन्त्रसे गदादेवी, '(ॐ) वं लं मं क्षं' बीजमन्त्रसे शङ्ख, '(ॐ) घं ढं भं हं' बीजमन्त्रसे श्रीलक्ष्मी, '(ॐ) गं जं वं शं' बीजमन्त्रसे पुष्टि, '(ॐ) घं वं' बीजमन्त्रसे वनमाला, '(ॐ) दंसं' बीजमन्त्रसे श्रीवत्स और '(ॐ) छं डं पं यं' बीजमन्त्रसे कौस्तुभमणि युक्त हैं। [इसके अतिरिक्त] मैं स्वयं अनन्त (विष्णु) हूँ। ये सभी उस देवाधिदेव विष्णुके अङ्ग हैं।
गरुड कमलके समान लाल, गदा कृष्णवर्ण, पुष्टि शिरीष-पुष्परंगके समान आभासे समन्वित तथा लक्ष्मी सुवर्ण-कान्तिसे सुशोभित हैं। शङ्ख पूर्ण चन्द्रकी कान्तिके समान श्वेत और कौस्तुभमणि नवोदित अरुणके सदृश वर्णवाला है। चक्र सहस्र सूर्योंकी कान्तिके सदृश और श्रीवत्स कुन्द पुष्पके समान श्वेत है। वनमाला पाँच वर्णोंसे युक्त पञ्चवर्णी और अनन्त भगवान् मेघकी भाँति श्याम वर्णका है। जिन अस्त्रोंके रंगोंका वर्णन यहाँ नहीं किया गया है, वे सभी विद्युत्-कान्तिके समान हैं। (भगवान् विष्णुके इन समस्त अङ्गोंको) 'पुण्डरीकाक्ष' नामक विद्यासे अर्घ्य और पाद्यादि समर्पित करने चाहिये। (अध्याय ११)
पूजानुक्रम-निरूपण
**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! देवके पूजनका जो क्रम है, उसके ज्ञानके लिये पूजाविधिके क्रमको कहा जा रहा है। सर्वप्रथम साधकको 'ॐ नमः' मन्त्रसे परमात्माका स्मरण करना चाहिये। तदनन्तर वह 'यं रं वं लम्' इन बीजमन्त्रोंके द्वारा शरीरकी शुद्धि करके 'ॐ नमः' इस मन्त्रसे चतुर्भुज भगवान् विष्णुके रूपमें ही अपनेको मान ले।
तत्पश्चात् करन्यास तथा देहन्यास करे। तदनन्तर हृदयमें योगपीठकी पूजाका विधान है। जिसको इन मन्त्रोंसे करे—