भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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२८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

तथा बाह्य और आभ्यन्तरिक एवं रूक्ष वायुके कारण जलन पैदा करनेवाला होता है। पित्तज वृद्धिरोग पके हुए गूलरके फलके समान दाह और ऊष्मासे युक्त होता है और पक जाता है। कफज वृद्धि कफजन्य होती है, वह तीव्र, गुरु, स्निग्ध और कठोर तथा खुजलीसे युक्त रहती है। इसमें अल्प वेदना होती है। रक्तज वृद्धि, कृष्णवर्ण, स्फोटसे युक्त, पिण्डके समान होती है और उसके वृद्धिका लक्षण पित्तजके समान होता है। मेदज वृद्धि मृदु और तालफलके समान होती है। इसके लक्षण कफजके समान होते हैं। जो मूत्रके वेगको धारण करते हैं, उनको मूत्रज वृद्धिरोग उत्पन्न होता है। इसमें मूत्रकृच्छ्र हो जाता है। मूत्रज वृद्धिमें अण्डकोष मसकके समान हिलता है। यह वेदनायुक्त और मृदु होता है। इसमें मूत्रकृच्छ्र हो जाता है और अण्डकोषके नीचेके भागमें कंकण-जैसा आकार उत्पन्न हो जाता है। आन्त्रज वृद्धिरोग वायुको कुपित करनेवाले आहारसे और शीतल जलमें स्नान करने तथा मल-मूत्रके वेगको रोकनेसे, अङ्गकी चेष्टाओंसे क्षुब्ध किये जानेपर जब ओजशक्ति क्षुब्ध होकर शरीरको क्षीण कर देती है, तब वायु दूषित होकर रक्तको नीचेकी ओर ले जाता है। इससे संधि-स्थानमें ग्रन्थिके समान शोथ हो जाता है।

वृद्धिरोगकी उपेक्षा करनेपर गुल्म-वृद्धि,* अन्त्र-वृद्धि, आध्मान आदि अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं। रोगी अत्यन्त पीड़ित हो जाता है। आभ्यन्तरमें शब्द होने लगता है और वायु शिरःप्रदेशमें आध्मान हो जाता है। रक्तज गुल्म वृद्धिरोग असाध्य है और इसके लक्षण वातज वृद्धिरोगके समान होते हैं। गुल्म वृद्धिरोग काली-नीली शिराओंके जालसे उसी प्रकार व्याप्त हो जाता है, जैसे कोई झरोखा मकड़ीके जालसे आवृत हो जाता है। यह गुल्मरोग आठ प्रकारका होता है—वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तकफ और (त्रिदोषज) सन्निपातिक। ऋतुसम्बन्धित रक्तके दूषित होनेपर आठवाँ (आर्तवदोषज) गुल्म केवल स्त्रियोंके गर्भाशयमें होता है।

जो मनुष्य ज्वर, मूर्च्छा, अतिसारके द्वारा एवं वमन-विरेचनादि पञ्चकर्मके द्वारा दुर्बल हो तथा वातकारक अन्नका भोजन करे; जो शीतसे अथवा भूखसे पीड़ित हो और भोजनसे पूर्व खाली पेट अधिक जल पीये अथवा जलमें तैरे एवं देहको क्षुब्ध करनेवाला उपवास करे तथा वमनका वेग न होनेपर भी वमन करनेका प्रयास करे, स्नेहन, स्वेदनके बिना वमन, विरेचन आदि करे अथवा ठीक प्रकारसे शुद्धि कर्मके बिना वात-विदाहि अन्नका सेवन करे या कष्ट देनेवाले सवारीपर चढ़े तो सम्पूर्ण वातादि दोष अलग-अलग या एक साथ मिलकर देहस्रोत (आम पक्वाशय)-में गमन करते हैं और ऊर्ध्व-अधोमार्गको आच्छादित या निरोध करके वायुशूल उत्पन्न करते हैं। ऐसी दशामें छूनेसे अनुभवमें आनेवाला, गरम, ऊँचा उठा हुआ तथा गाँठ-जैसा गुल्मरोग उत्पन्न हो जाता है।

धातुके क्षीण हो जानेसे कफ, विष्ठादिके द्वारा मार्ग अवरुद्ध हो जानेसे वायु कोष्ठमें स्थित हो जाता है और रूक्षताके कारण कठोर हो जाता है। यह अपने आश्रय (अथवा पक्वाशय)-में स्वतन्त्र रूपसे दुष्ट हो जाता है और पराश्रय (आमाशय)-में परतन्त्र-भावसे (कफादिके अधीन) दुष्ट हो जाता है। तदनन्तर मल एवं श्लेष्मासे संयुक्त होनेके कारण पिण्ड-जैसा हो जाता है। इसे वातगुल्म कहते हैं। यह वस्ति, नाभि, हृदय और पसलियोंमें उत्पन्न होता है। वातज गुल्मरोगमें सिरमें पीड़ा, ज्वर, प्लीहा, आन्त्रकूजन, सूईके वेधके समान


* च०नि०अ० ३, सु०उ०तं०अ० ४२, अ०हृ०नि०अ० ११।