गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] विद्रधि एवं गुल्म-निदान २८९
पीड़ा—ये सभी उपद्रव होते हैं और बहुत कष्टसे मूत्र होता है। उक्त रोग वायुचालित होकर शरीर, मुख, पैर, शोथ, अग्निमान्द्य आदि उपद्रवको उत्पन्न करता है। विशेषतः शरीरमें चमड़ा रूक्ष और कृष्णवर्णका हो जाता है। वायुके चञ्चल होनेके कारण गुल्मरोगका कोई निर्दिष्ट एक स्थान नहीं है। अतः यह अनेक प्रकारकी व्यथाएँ उत्पन्न करता है। वातज गुल्मरोगमें चींटीके चढ़ने या काटने-जैसा स्फुरण होता है और चुभनेकी तरह व्यथा होती है।
पित्तज गुल्मरोगमें दाह, अम्लोद्गार, मूर्च्छा, मलभेद, पसीना, तृष्णा और ज्वर—ये सभी उपद्रव होते हैं। सम्पूर्ण शरीर हल्दीके वर्णका हो जाता है। इस रोगमें शोथ भी हो जाता है और श्लेष्मा घटता-बढ़ता रहता है। गुल्मके स्थानमें जलन-सी प्रतीत होती है।
कफज गुल्मरोगमें स्तैमित्य, अरुचि, सिरमें वेदना और अङ्गोंमें शिथिलता, शीतज्वर, पीनस, आलस्य, हृल्लास, चमड़ेका सफेद या काला होना आदि लक्षण होते हैं। कफज गुल्म गम्भीर, कठिन और गर्भस्थ बालकके समान भारी होता है। अपने स्थानमें स्थित रहने तथा वहाँसे न चलनेके कारण यह मृत्युकारक होता है।
त्रिदोषजन्य गुल्मरोगमें प्रायः एक-दूसरेके लक्षण घुले-मिले रहते हैं। इसमें तीव्र वेदना और अतिशय दाह होता है। यह अतिशय उन्नत और सघन होकर शीघ्र ही पक जाता है, तथा असाध्य है।
रक्तगुल्म¹ स्त्रियोंको ही होता है। जिस स्त्रीको ऋतुकालमें अतिशय वेदना या किसी प्रकारका योनिरोग रहता है अथवा वायुकारक पदार्थोंको सेवन करनेसे वायु कुपित होकर प्रतिमाह व्यवस्थित ऋतुस्रावको योनिमें ही रोक देता है तो वह रुका हुआ रक्त कुक्षिमें जाकर गर्भके चिह्नोंको प्रकट करता है। इस रोगमें हृल्लास, गर्भिणी-जैसी इच्छा, स्तनमें दुग्ध-दर्शन, कामाचारिता आदि लक्षण प्रकाशित होने लगते हैं। क्रमशः वायुके संसर्गसे पित्त योनिमें रक्तका संचय करता है। शोणित जब गर्भाशयका आश्रयण करता है, तब वात-पित्तज गुल्मके विकार उत्पन्न हो जाते हैं। यह दुष्ट रक्तका आश्रय लेकर गर्भाशयमें अत्यन्त शूल उत्पन्न करता है। योनिमें स्राव, दुर्गन्ध, कभी-कभी स्पन्दन और वेदना होती है। कभी-कभी यह गुल्म गर्भ-जैसा हो जाता है।
दुष्ट रक्त एवं दुष्ट आश्रयके कारण यह विद्रधि गुल्म कभी देरमें पकता है, कभी नहीं पकता है और कभी जल्दी पक जाता है। अतः शीघ्र दाह पैदा करनेवाला होनेके कारण यह विद्रधि गुल्म कहा जाता है। अन्तराश्रय गुल्ममें वस्ति, कुक्षि, हृदय और प्लीहामें वेदना होती है। जठराग्नि और बलका नाश हो जाता है। मल-मूत्रादिका वेग रुद्ध हो जाता है। बहिराश्रय गुल्ममें इसका उलटा होता है अर्थात् वस्ति, कुक्षि आदिमें वेदना अधिक नहीं होती, वेगका प्रवर्तन होता है। गुल्म-स्थानमें विवर्णता और बाहरके भागमें अत्यधिक ऊँचापन आदि लक्षण उपस्थित होते हैं। ऊपर-नीचे वायुरोधके कारण तीव्र वेदना और उदरमें आध्मान होता है। इसे अनाहरोग कहते हैं। जो ग्रन्थि ऊपर उठी होती है तथा कठोर अष्ठीलाकी तरह होती है, उसे अष्ठीला विद्रधि कहते हैं। उसकी आकृति यदि समस्त चिह्नोंसे युक्त एवं तिरछी हो तो उसे प्रत्यष्ठीला कहते हैं। पक्वाशयमें उत्पन्न होनेवाला वायु तीव्र वेदनासे युक्त होकर डकारोंकी अधिकता, शौचका विबन्ध, भोजनकी अनिच्छा, आँतोंका सूजन, आटोप आध्मान, अग्निमान्द्य—ये सब उत्पन्न होनेवाले गुल्मके पूर्व संकेत हैं।²
(अध्याय १६०)
१-सु०उ०तं०अ०, ४२ अ०हृ०नि०अ० १२। २-सु०नि०अ० ६१, च०नि० ३, चि०अ० ५०, अ०हृ०नि०अ० ११, वाग्भट नि० ११।