गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] उदररोग-निदान २९१
वामपार्श्वमें स्थित प्लीहा अपने स्थानसे च्युत होकर वृद्धिको प्राप्त होने लगता है। प्लीहा पहले कठोर तथा पुनः उन्नत या उठा हुआ होकर उदररोग उत्पन्न करता है और श्वास-कास, मुख-विरसता, अफरा, शूल, पाण्डु, वमन, मूर्च्छा, शरीरवेदना, दाह, विभ्रम आदि अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं। उदरका रंग काला, लाल, विकृत नीला एवं पीला हो जाता है। प्लीहोदरमें भी वात, पित्त और कफका सम्बन्ध रहता है। प्लीहाके समान ही उदरके दक्षिण भागमें स्थित यकृत विकृत होकर भी उदररोग उत्पन्न करता है।
कुपित अपानवायु मल (पुरीष), पित्त एवं कफको अवरुद्ध करके उदरमें बद्ध गुदोदर नामक रोग उत्पन्न करता है और ज्वर, कास, श्वास एवं सिर, नाभि, पार्श्व और गुदामें पीड़ा उत्पन्न करता है। उदर स्थिर एवं अचल बना रहता है। उसपर नीली एवं लाल शिराओंका जाल दीखता है और उदरके ऊपरका हिस्सा गायकी पूँछके समान होकर मल संचय होता रहता है।
भोजनमें हड्डी और पाषाण आदि उदरमें जानेसे तथा अत्यधिक खानेसे आँतोंके फटनेपर पककर मवाद एवं मलके साथ जल निकलकर गुदामार्गसे जब बाहर आता है, वह पीला, लाल पुरीष गन्धयुक्त रहता है। अवशिष्ट भाग पेटमें रुककर उदर-वृद्धि करके जलोदररोग होकर बादमें वातादि दोषोंसे पुनः विकृत हो परिस्रावीच्छिद्रोदर रोग हो जाता है।
स्नेहपान, स्वेदन, वमन, विरेचन करते समय एकाएक ठंडा जल अधिक पान करनेसे मन्दाग्नि रहनेपर या दुर्बलतामें अधिक आम जल पीनेपर वायु एवं कफ कुपित होकर जलवाही स्रोतोंको अवरुद्ध कर उस दूषित जलको बढ़ा देता है और क्लोम, नलिकासे आकर अवरुद्ध हो उदररोग उत्पन्न कर देता है। तदनन्तर प्यास, गुदासे जलस्राव होता हुआ उदरमें वेदना होती रहती है। पुनः कास-श्वास एवं अरुचि हो जाती है। उदरपर अनेक रंगकी शिराएँ उभर आती हैं। उदर जलपूर्ण-सा हो जाता है तथा उसमें कम्पन आदि अनेक उपद्रव प्रारम्भ हो जाते हैं, इस स्थितिमें उसे दकोदर, उदकोदर या जलोदररोग कहते हैं। उदर-रोगोंकी उपेक्षा करनेसे वातादि दोष अपने स्थानसे विमुख होकर जलको बढ़ाकर उस जलसे शरीरके जोड़ोंके स्रोतोंके मुखोंको गीला या आर्द्र कर देते हैं। अतः शरीरके* पसीनेके रुकनेपर सभी स्रोत अवरुद्ध हो जाते हैं। इससे उदर परिपूर्ण होकर उदररोग उत्पन्न होता है। किसी-किसी रोगीके उदरमें अधिक जलके सञ्चित हो जानेपर वह वर्तुलाकार हो जाता है, उसको ताड़न करनेपर शब्द नहीं होता। इस रोगमें रोगी क्रमशः दुर्बल हो जाता है। यह रोग भयंकर होता है और नाड़ीको दबानेपर जल आगे बढ़ जाता है। उदररोगमें जब उदरगत शिराएँ अन्तर्हित हो जाती हैं, तब उस रोगको सभी लक्षणोंसे आक्रान्त कहा जाता है। वातोदर, पीतोदर, कफोदर, श्लेष्मोदर, प्लीहोदर, सन्निपातोदर और जलोदर—ये क्रमशः कष्टसाध्य होते जाते हैं। एक पक्षके भीतर ही इस रोगमें जल एकत्र होने लगता है। ये सभी उदररोग जन्मसे ही कष्टसाध्य होते हैं। (अध्याय १६१)
* च०चि०अ० १३, सु०नि०अ० ७, अ०हृ०नि०अ० १३।