गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
पाण्डु-शोथ-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं पाण्डु और शोथरोगका निदान कहता हूँ, सुनो! पित्त-प्रधान द्रव्योंसे सम्पूर्ण वातादि दोष कुपित करनेवाले हेतुओंसे पित्त एवं मल कुपित होकर पाण्डुरोग उत्पन्न करते हैं। इन तीनों कुपित दोषोंमेंसे बलवान् वायु-पित्त हृदयस्थ दस धमनियोंका आश्रय लेकर सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाता है। वह पित्तका आश्रयणकर श्लेष्मा, चर्म, रक्त, मांस आदिको दूषित कर देता है। इससे दूषित रक्त चमड़े और मांसके बीचमें जाकर चमड़ेको भिन्न-भिन्न रंगका कर देता है। इस रोगमें चमड़ा हरिद्रादि अनेक रंगका हो जाता है, परंतु इसमें पीले रंगकी अधिकता रहती है। इसीसे इसे पाण्डुरोग कहते हैं। इस रोगमें धातुका गुरुत्व और स्पर्शमें शिथिलता होती है। अम्लजन्य पाण्डुरोगमें शरीरके सभी प्रकारके गुण नष्ट हो जाते हैं। इससे शरीरका रक्त क्रमशः कम हो जाता है, मेदा और अस्थि निस्सार हो जाते हैं। इस रोगमें सभी अङ्ग निर्बल हो जाते हैं, हृदयमें द्रवता आ जाती है एवं नेत्रोंमें सूजन हो जाती है। मुँहमें लालायुक्त लारकी अधिकता हो जाती है। रोगीको प्यास कम लगती है, ठंडक अच्छी नहीं लगती, रोमाञ्च और मन्दाग्नि हो जाती है एवं शरीरकी शक्ति घट जाती है तथा ज्वर, श्वास, कर्णशूल, चक्कर—ये सभी उपद्रव होने लगते हैं।
पाण्डुरोग* पाँच प्रकारके हैं—वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज एवं मृत्तिका-भक्षणजन्य। हृदयमें स्पन्दन, चमड़ेकी रूक्षता, अरुचि, मूत्रकी पीतवर्णता, पसीना और मूत्रका कम होना—ये सभी पाण्डुरोगके पूर्वरूप हैं। वायुजन्य पाण्डुरोगमें तीव्र वेदना, शरीरमें चिपचिपाहट आदि लक्षण दिखायी देते हैं। इस रोगमें शिरा, नख, विष्ठा, मूत्र और नेत्र कृष्णवर्ण तथा अरुणवर्णके हो जाते हैं। इससे शोथ, नासिका और मुखमें विरसता, मलशोष, पार्श्वमें वेदना—ये सभी उपद्रव होने लगते हैं। पित्तज पाण्डुरोगमें शिराएँ आदि हरित पित्त-जैसी हो जाती हैं एवं ज्वर, आँखोंके आगे अँधेरा, प्यास, शोष, मूर्च्छा, दुर्गन्ध, शैत्य-सेवनकी इच्छा, मुखमें कड़वाहट—ये सभी लक्षण व्यक्त होने लगते हैं। कफज पाण्डुरोगमें हृदयमें आर्द्रता, मलभेद, खट्टी डकार और दाह होता है। तन्द्रा, मुखमें लवण-रसका स्वाद, श्वास, रोमाञ्च, स्वरभंग, कास, वमन, दुःसहता—ये सभी लक्षण व्यक्त होने लगते हैं। त्रिदोषज होनेपर इसके लक्षणोंको पहचानना कठिन हो जाता है और अतिशय असह्य हो जाता है। मिट्टी खानेसे उत्पन्न पाण्डुरोगमें कसैली मिट्टी वायु, खारी मिट्टी पित्त और मीठी मिट्टी कफको दूषित करके तथा रस आदिको सुखा करके शिराओंको रक्तसे भर देती है तथा उसे वहीं रोक देती है और पाण्डुरोग पैदा हो जाता है। पाण्डुरोगके बढ़ जानेपर नाभि, पैर, मुख और मूत्रमार्गमें शोथ हो जाता है। कृमियुक्त तथा रक्तमिश्रित और कफसमन्वित मल निकलने लगता है।
जो पाण्डुरोगी पित्त उत्पन्न करनेवाले पदार्थोंका सेवन करता है, उसका पित्तरक्त और मांसका दाह करके कोष्ठ शाखामें मिलकर कामलारोग उत्पन्न करता है। कामला-रोगमें रोगीका मूत्र, नेत्र, त्वक्, मुख और विष्ठा हल्दीके रंगका हो जाता है। रोगी दाह, अविपाक और तृषासे पीड़ित होकर मेढकके समान पीला और दुर्बल हो जाता है। पाण्डुरोगीको पित्तज शोथ होने लगता है। इसकी
* च०चि० १६, सु०उ०तं०अ० ४३, अ०हृ०सू० २।