गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] कृमि-निदान २९१
कृमि-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! बाह्य और आभ्यन्तर भेदके कारण कृमियोंके दो प्रकार हैं। उनमें बाह्यगत जो कृमि (कीड़े) होते हैं, उनका जन्म बाहरी मल, कफ, रक्त और विष्ठासे होता है। जन्मगत भेदके कारण उनके चार भेद हो जाते हैं, किंतु नाम-भेदसे कृमियोंके बीस प्रकार माने गये हैं। बाह्य कृमि बाह्य मलसे उत्पन्न होते हैं। इनका परिमाण, आकार और वर्ण तिलके समान होता है। इनका निवास प्राणियोंकी केशराशि तथा उनके वस्त्रोंमें होता है। अनेक पैरोंवाले उन कृमियोंकी आकृति सूक्ष्म होती है। नामतः उन्हें जूँ और लीख कहा जाता है। इन दोनों प्रकारवाले कृमियोंके द्वारा प्राणियोंके बाह्य शरीरपर कोष्ठ (चकत्ते), पिडिका (फुंसी), कण्डू (खुजली) तथा गण्ड (गाँठ)नामक रोग कहे जाते हैं।
कुष्ठरोगका एकमात्र कारण शरीरके आभ्यन्तरिक भागमें उत्पन्न होनेवाला श्लेष्मज कृमि है। यह प्राणीके बाह्य श्लेष्ममें भी उत्पन्न हो सकता है। मधुर अन्न, गुड़, दूध, दही, मछली और नये चावलका भात खानेसे प्राणीके आभ्यन्तरिक भागमें कफ उत्पन्न होता है, उसी कफसे उत्पन्न होकर कृमिवर्ग आमाशयमें पहुँच जाता है। उसीमें इस कृमिवर्गकी अभिवृद्धि होती है और उसीसे निकलकर शरीरमें यह सब ओर फैल जाता है। उनमें कुछ चमड़ेकी मोटी ताँतके समान, कुछ केंचुएके सदृश, कुछ धान्याङ्कुरके समान छोटे-बड़े और कुछ अणुकी भाँति होते हैं। इनका वर्ण श्वेत तथा ताँबे-जैसा होता है। नामतः इन कृमियोंके सात प्रकार हैं—अन्नाद, उदरावेष्ट, हृदयाद, महागुद, च्युरव, दर्भकुसुम और सुगन्ध।
इन कृमियोंके उत्पन्न होनेसे प्राणीके हल्लास, मुखस्राव (लार), अपच, अरुचि, मूर्च्छा, वमन, ज्वर, आनाह, कृशता, शोथ तथा पीनस नामक रोगोंकी उत्पत्ति होती है।
रक्तवाही शिराओंमें स्थित रक्तसे उत्पन्न होनेवाले कृमि अणुरूप, पादविहीन, वृत्ताकार और ताम्रवर्णके होते हैं। अपनी सूक्ष्मताके कारण उनमेंसे कुछ कृमि तो दृष्टिगोचर ही नहीं होते। इनके केशाद, रोमविध्वंस, रोमद्वीप, उदुम्बर, सौरस तथा मातर—ये छः भेद हैं। इन सभी कृमियोंका एकमात्र कार्य कुष्ठरोग उत्पन्न करना है।
पक्वाशयमें गुदा-भागसे बाहर निकलनेवाले विष्ठाजन्य कृमियोंका उद्भव होता है। वहींपर बढ़कर जब ये आमाशयकी ओर उन्मुख होते हैं, तब प्राणियोंके डकार और श्वासमें विष्ठा-सदृश दुर्गन्ध आती है। वे कृमि लम्बे, गोल, छोटे और मोटे होते हैं। उनका वर्ण श्याम, पीत, श्वेत और कृष्ण होता है। उन कृमियोंके ककेरुक, मकेरुक, सौसुराद, शूलाख्य तथा लेलिह—ये पाँच नामभेद हैं। जब ये प्रकुपित हो उठते हैं तो प्राणीके शरीरमें मलभेद, शूल, विष्टम्भ, कृशता, कर्कशता, पाण्डुता, रोमाञ्च, मन्दाग्नि और पाण्डु तथा गुदामें खुजलाहट का दोष उत्पन्न हो जाता है।
(अध्याय १६५)
१-वा० नि० अ० १४। २-सु० उ० तं० अ० ५४ ।