गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वातव्याधि-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं आपको वातव्याधिका निदान सुना रहा हूँ, उसे आप सुनें।
शरीरमें विशेष रूपसे सर्वथा अनर्थ और विघ्नोंका एकमात्र कारण न दिखायी देनेवाला दुष्ट (प्रकुपित) पवन ही है। वह वायु ही विश्वकर्मा, विश्वात्मा, विश्वरूप, प्रजापति, स्रष्टा, धाता, विभु, विष्णु, संहर्ता, मृत्यु और अन्तक-रूप है। इसलिये उस वायुको सम रखनेके लिये विशेष रूपसे प्रयत्न करना चाहिये।
उस वातबाधित शरीरसे सम्बद्ध, कहे गये दोष-विज्ञानमें कर्म दो प्रकारका माना गया है। उनमें एक है प्राकृत कर्म और दूसरा है वैकृत कर्म। संक्षेपमें प्रतिपादित दोष-भेदोंका विचार करके प्रत्येक कर्मके पाँच-पाँच दोष सिद्ध किये गये हैं। इनमें वैकृत कर्म-दोष प्राकृतकी अपेक्षा शक्तिशाली और गतिमान् होता है। अब यहाँ यथाविभाग लक्षणसहित उसके निदानको कहा जा रहा है।
शरीरकी धातुओंको क्षीण करनेवाले द्रव्य-पदार्थोंके उपभोग तथा आचार-विचारसे क्रुद्ध वायु अत्यधिक समरूपमें प्रवहमान नहीं रहता। वह रस आदिके चारों स्रोतोंसे प्रवाहित होकर पुनः उनमें तज्जनित दोषोंको परिपूर्ण कर देता है। उसके बाद उन दोषपूर्ण स्रोतोंसे निकलकर वह संक्षुब्ध वायु उसके मुखको विधिवत् आच्छादित करके रोगीके शरीरमें शूल, आनाह, आन्त्रकूजन, मलावरोध, स्वरभंग, दृष्टिभेद, पीठ तथा कटि-प्रदेशमें पीड़ादायक उपद्रवोंको जन्म देता है। उसीके प्रभावसे रोगीके शरीरमें अन्य ऐसे उपद्रवोंका जन्म होता है, जो कष्टसाध्य हैं।
आमाशयमें वात-दोष होनेपर वमन, श्वास, खाँसी, विषूचिका, कण्ठावरोध तथा नाभिके ऊपरके भागमें अनेक व्याधियोंका जन्म होता है। कुपित वायु नेत्र-कान आदि इन्द्रियोंमें विघ्न तथा त्वचा-भागमें प्रविष्ट होकर पककर फूटनेवाले फोड़े और रूक्षताका कारण बन जाती है। रक्तमें वायुके प्रविष्ट होनेसे रोगीको अत्यन्त कष्टदायक पीड़ा होती है, श्वास तथा गलेमें जलन और स्वरभेदका रोग होता है। आँतके मध्य प्रदूषित वायुके पहुँचनेपर विष्टम्भ, अरुचि, कृशता और भ्रमके रोगोंकी उत्पत्ति होती है। मांस और मेदामें प्रकुपित हुआ वायु शरीरमें ग्रन्थि, कर्कशता, भारीपन, लाठी एवं मुष्टि-प्रहारसे होनेवाली पीड़ाके समान पीड़ा उत्पन्नकर रोगीको अत्यधिक कष्ट देता है। अस्थियोंमें प्रविष्ट हुए संक्षुब्ध वायुसे सक्थि तथा संधि-स्थानोंमें रहनेवाली अस्थियोंके अन्तर्गत तीव्र शूल उठनेसे रोगीको कष्ट होता है।
मज्जागत कुपित वायु रोगीकी अस्थियोंमें क्षरण एवं अनिद्रा उत्पन्न करता है, जिससे रोगीको पीड़ा होती है। शुक्रगत कुपित वायु वीर्य और गर्भका शीघ्र पतन करता है अथवा वह विकृत हो जाता है। शिरागत वायु सिरमें पीड़ा और रिक्तताका अनुभव कराता है। स्नायु-स्थित क्रुद्ध वायु रोगीके शरीरमें शोथ उत्पन्न कर देता है, जिसके कारण उसको अधिक कष्ट होता है।
शरीरके संधि-स्थानोंमें प्रवहमान प्रकुपित वायुके कारण रोगी जलसे परिपूर्ण दृति (गलगण्ड), स्पर्श तथा शुष्कताके उपद्रवसे ग्रस्त हो जाता है। शरीरके समस्त अङ्गोंमें कुपित वायुके प्रविष्ट हो जानेपर पीड़ा, टूटन और स्फुरणका दोष होता है। स्वप्नावस्थामें विकार होनेसे वायु-स्तम्भन, आक्षेपण, संधिभंग तथा कम्पनका दोष प्राणीके शरीरमें उत्पन्न कर