गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 311, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] वातव्याधि-निदान ३०१
देता है। जब क्रुद्ध वायु शरीरकी सम्पूर्ण धमनियोंमें बारम्बार प्रवाहित होने लगता है तो उस समय शरीरके अङ्ग विक्षिप्त हो उठते हैं। इस व्याधिको आक्षेपण नामसे कहा गया है।
जब नीचेसे ताड़ित वायु कुपित होकर ऊपर चढ़ता है और फिर ऊर्ध्वभागकी ओर प्रवाहित होने लगता है, तब वह रोगीके हृदयको पीड़ितकर सिर और मस्तककी अस्थिमें पीड़ा उत्पन्न कर देता है। वह चारों ओरसे शरीरपर प्रहार करता है, जिससे शरीर विक्षिप्त हो उठता है। वह हनु और मुखकी शक्तिको भी क्षीण करके रोगीको व्यथित करनेका प्रयास करता है। रोगी बड़े ही कष्टसे श्वास लेता और उसका परित्याग करता है। उसके दोनों नेत्र बंद होने लगते हैं। कण्ठसे कबूतरके समान ध्वनि होने लगती है और रोगी ज्ञानशून्य होने लगता है। चिकित्सा-क्षेत्रमें इसका नाम अपतन्त्रक रोग है। हृदयमें स्थित दोषपूर्ण वायुके द्वारा प्रेरित वह रोग जब रोगीकी वाम नासिकाके छिद्रमें जाकर आश्रय लेता है, तब उसके कारण रोगी बार-बार स्वस्थता और बार-बार अस्वस्थताका अनुभव करता है।
अभिघातजन्य वातव्याधि (अपतानक रोग) अत्यन्त दुश्चिकित्स्य है।
जब कुपित वायु ग्रीवा और पार्श्वमें स्थित मन्या नामवाली दोनों शिराओंको जकड़कर और सम्पूर्ण धमनियोंका आश्रय लेकर सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाती है, जिससे गर्दन तथा कक्षकी संधियाँ टेढ़ी पड़ जाती हैं और शरीर भीतरकी ओर धनुषकी तरह झुक जाता है, रोगीके नेत्र स्तम्भित हो जाते हैं, वह जँभाई लेने लगता है, दाँतोंको चबाने लगता है, कफयुक्त वमन करता है, दोनों पसलियोंमें वेदना होती है, वाणी रुक जाती है तथा हनु, पृष्ठ और मस्तक जकड़ जाते हैं, तब इसको अन्तरायाम वातरोग कहते हैं।
बहिरायाम रोगमें शरीर बाहरकी ओर धनुषके सदृश झुक जाता है। वक्षःस्थल ऊँचा हो जाता है और सिर तथा कंधा पीछेकी ओर झुक जाता है। दाँतों तथा मुखका रंग बदल जाता है, पसीना अधिक आता है, शरीर शिथिल हो जाता है। इस वातव्याधिको बाह्यायाम या धनुस्तम्भ कहा जाता है।
रोगीके मल, मूत्र और रक्तमें प्रविष्ट हुआ वात-दोष सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर शरीरमें अनेक प्रकारके दोष उत्पन्न करता है। इस रोगको व्रणायाम कहते हैं। जिस व्रणायाम रोगमें रोगीको अत्यन्त तृषा हो और उसका शरीर पीला पड़ गया हो, वह असाध्य होनेसे वर्जित है। सभी प्रकारके आक्षेपक रोगोंमें वायुका वेग शान्त हो जानेपर रोगी स्वस्थ हो जाता है।
जिह्वाको* अत्यधिक रगड़ने और उष्ण भोजन करनेसे हनु अर्थात् ठोड़ीमें स्थित वायु कुपित होकर हनुभागमें स्तम्भन-दोष उत्पन्न करके मुखको खोल देता है अथवा बंद कर देता है। इसीको वातव्याधिमें हनुस्तम्भ-व्याधि कहते हैं। इसके कारण रोगीको खाने-चबाने तथा बोलनेमें अधिक कठिनाई होती है।
कुपित वायु वाग्वाहिनी शिरामें स्थित होकर जिह्वाको स्तम्भित कर देता है। यह जिह्वास्तम्भ नामक वातव्याधिका भेद माना गया है। इसके दुष्प्रभावसे रोगीके मुखमें खाने-पीने तथा बोलने-चालनेकी सामर्थ्य नहीं रह जाती। सिरके द्वारा भार ढोने, अत्यन्त हँसने और बोलने, ऊबड़-खाबड़ स्थानपर सोने तथा कठोर पदार्थोंके चबानेसे वायु विकारयुक्त होकर शरीरमें बढ़ता है और ऊर्ध्वभागमें पहुँचकर आश्रित हो जाता है। इससे रोगीका मुख
* सु०शा०अ० ९।