भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 314
३०४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भागपर उत्पन्न होकर मांस-भागमें आश्रय ग्रहण करता है। उसके बाद सभी धातुओंको आश्रय बना लेता है। इसे गम्भीर नामक वातरक्त कहते हैं। उत्तान वातरोगमें रोगीके कटि आदि स्थानोंका चर्म, ताम्र या श्यामवर्णका हो जाता है। वहाँपर शोथ तथा ग्रथित पाक उत्पन्न होता है। वह प्रकुपित वायु रोगीकी हड्डियों और मज्जा-भागमें जाकर वहाँ आश्रय लेकर छेदनेके समान पीड़ा करता हुआ चक्रके समान घूमता हुआ शरीरके अङ्गोंको टेढ़ा-मेढ़ा कर देता है। तदनन्तर सब ओरसे शरीरमें प्रवहमान वह वायु अन्तमें रोगीको खञ्ज अथवा लँगड़ा बना देता है।

शरीरमें वाताधिक्य वातरक्त-रोग होनेपर अत्यधिक शूल, फड़कन तथा टूटन-भरी पीड़ाकी अनुभूति होती है। उभरे हुए शोथमें रूक्षता, कृष्ण या श्यामवर्णता आ जाती है। इसमें शोथ कभी बढ़ जाता है और कभी घट जाता है। रोगीकी धमनियों और अँगुलियोंके संधि-स्थानोंमें संकुचन, अङ्गग्रह तथा अत्यन्त वेदनाजन्य कष्ट होता है। इसमें शीतल पदार्थोंसे अरुचि एवं उसके सेवनसे वृद्धि, स्तम्भन, कम्पन और इन्द्रियशून्यताके दोष भी आ जाते हैं।

रक्ताधिक वातरक्त-रोगमें शोथ अत्यन्त पीड़ासे युक्त होता है। इसमें सूचिका-भेदजन्य पीड़ा भी होती है। इसका वर्ण ताँबेके समान होता है। यह चुनचुनाता भी रहता है। इसमें ललाई रहती है तथा खुजली और क्लेद होता है। स्निग्ध पदार्थ लगानेसे या उसे रूक्ष रखनेसे शान्ति नहीं मिलती।

पित्ताधिक वातरक्तमें अत्यन्त दाह, सम्मोह, स्वेद, मूर्च्छा, मद, तृष्णा, स्पर्श, असहत्व, अत्यधिक पीड़ा, शोथ, पककर फूटनेवाला फोड़ा तथा अत्यन्त ऊष्माके लक्षण दिखायी देते हैं।

कफाधिक वातरक्तमें कठोरता, भारीपन, शून्यता, स्निग्धता, शीतलता, खुजली और मन्द पीड़ा होती है। द्वन्द्वज दोषमें दो तथा त्रिदोषजमें तीनों दोषोंके लक्षण उभरते हैं। इनमें एक दोषजन्य रोग अपेक्षित चिकित्सासे साध्य है। द्वन्द्वज दोष नामक वातरक्त-रोग अथक चिकित्सोपचारके द्वारा रोका जा सकता है। किंतु जो रोग त्रिदोषजन्य है, उसे तो छोड़ देना चाहिये। उसकी शान्तिके लिये प्रयास करना व्यर्थ है, वह असाध्य होता है। इनमें रक्तपित्तजन्य वातरोग तो बड़ा ही कठिन माना गया है।

प्रकुपित वायु रोगीके शरीरस्थ अङ्ग-विशेषके रक्तको नष्ट करके उसके संधि-स्थानोंमें प्रविष्ट हो जाता है। तदनन्तर परस्पर एक-दूसरेको भली प्रकारसे अवरुद्ध करके तज्जनित वेदनासे वह रोगीके प्राणोंका अपहरण करता है।

प्राण, व्यान, समान, अपान और उदान—इस पञ्चात्मक वायु-समूहके बीच प्राणवायु जब रूक्षता, चञ्चलता, लंघन, अतिशय आहार, अभिघात, मलमूत्रादिक वेगावरोध तथा कृत्रिम वेग-संचालनके प्रयासमें कुपित होकर नेत्रादिक इन्द्रियोंमें उपघात करता है तो उसके कारण पीनस, दाह, तृष्णा, खाँसी और श्वासादिके रोग उत्पन्न होते हैं।

कुपित उदानवायु जत्रु (ठोढ़ी) और मूर्द्धामें आश्रय लेकर कण्ठावरोध, मलभेद, वमन, अरुचि, पीनस तथा गलगण्डादिक दोषोंको जन्म देता है।

अत्यधिक दूरकी यात्रा, स्नान, अतिशय क्रीड़ा, अत्यन्त विषय-भोगकी चेष्टा, स्वास्थ्य-विरुद्ध व्यवहार, रूक्षता, भय, हर्ष तथा विषादके कारण प्राणीके शरीरमें स्थित व्यान नामक वायु दूषित हो उठता है। तदनन्तर वह रोगीके पुंसत्व (पुरुषत्व), उत्साह और शक्तिका ह्रास कर देता है। उसके चित्तमें शोक तथा विभ्रमकी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उसे ज्वर, सम्पूर्ण शरीरमें सूचिका-भेदके समान वेदना, रोमाञ्च, स्पर्श-शून्यता, कुष्ठ, विसर्प और सभी अङ्गोंमें पीड़ा होती है।