भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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काण्ड ] वातरक्त-निदान ३०५


स्वास्थ्य-विरुद्ध अजीर्णकर, शीतल तथा संकीर्ण दोषसे पूर्ण भोजन, असामयिक शयन और जागरण आदिसे समान नामक वायु दूषित हो जाता है। इसके प्रकुपित होनेसे शूल, गुल्म, ग्रहणी आदि सामान्य यकृतजन्य तथा कामाश्चित रोगोंकी उत्पत्ति होती है।

अत्यन्त रूक्ष तथा भारी अन्नके सेवन, मल-मूत्रका वेग रोकने, अतिशय भार ढोने, वाहनकी अधिक सवारी करने, मदिरापान, अत्यधिक देरतक खड़े होने तथा अधिक घूमने-फिरनेसे अपानवायु कुपित हो जाता है। वह प्रकुपित वायु प्राणीके शरीरमें पक्वाशयसे आश्रित समस्त रोगोंको उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त रोगीके शरीरमें मूत्र, वीर्य, अर्श तथा मलावरोध आदिसे सम्बन्धित बहुतसे रोग प्रकट हो जाते हैं।

तन्द्रा, स्तिमिता, गुरुता, स्निग्धता, अरुचि, आलस्य, शैत्य, शोथ, अग्निमान्द्य, कटु और रूक्ष पदार्थोंकी अभिलाषा आदि लक्षणोंसे युक्त वायुको साम अर्थात् आम-सदृश कहते हैं। जिसमें तन्द्रा आदिके विपरीत लक्षण होते हैं, वह वायु निराम कहलाता है।

साम-निरामके लक्षण बताकर अब वायुके आवरण और भेदोंका वर्णन किया जाता है। पित्तदोषसे आवृत वात-विकार होनेपर दाह, तृष्णा, शूल, भ्रम और आँखोंके आगे अन्धकार छा जाता है। कटु, उष्ण, अम्ल तथा लवणके प्रयोगसे रोगीमें विदाह और शीतकी अभिलाषा बढ़ जाती है। कफावृत वात-विकारमें रोगी शीतल, रूक्ष और उष्ण भोजन करनेका इच्छुक होता है। उसको शीतलता, भारीपन, शूल, लंघन, अग्निदाह, कटु घृतयुक्तमुख तथा अधिक तृष्णाके दोष घेर लेते हैं। इस कफावृत रोगमें अङ्ग-दर्द, उबकाई और अरुचि भी होती है।

रक्तावृत वातरोग होनेपर रोगीके चर्म तथा मांसमें दाह और पीड़ा अधिक होती है। रोगीके शरीरमें लाल वर्णका शोथ हो जाता है और मण्डलाकार चकत्ते पड़ जाते हैं। वायुके मांसाश्रित होनेपर शोथ बड़ा कठोर लगता है। उस रोगीको उबकाई आती है और शरीरमें छोटी-छोटी फुंसियाँ निकलने लगती हैं। ऐसे शोथमें रोमाञ्च भी होता है और शरीर चींटियोंसे व्याप्त हुएके समान प्रतीत होता है। मेदसे आवृत वायु-विकारमें यह शोथ शरीरमें चलायमान, मृदु तथा शीतल होता है और अरुचिकर भी होता है। मेदासे आवृत वात अन्य वातरोगोंकी अपेक्षा अत्यन्त कष्टसाध्य है। इसको आढ्यवातके समान समझना चाहिये। इस रोगके होनेपर उत्पन्न हुआ शोथ स्पर्श तथा आच्छादन करनेसे उष्ण तथा आवरण हटा देनेपर शीतल लगने लगता है।

वायुके मज्जावृत शोथ होनेपर उक्त लक्षणके विपरीत लक्षण दिखायी देते हैं। उसमें फैलाव और कसाव होता है, शूलजनित पीड़ा होती है तथा दोनों हाथोंसे मर्दन करनेपर रोगीको सुख प्राप्त होता है।

शुक्रावृत वात-शोथ होनेपर शुक्रमें अधिक वेग नहीं रह जाता। वायुके अन्नसे आवृत होनेपर भोजन करनेपर रोगीके कुक्षिभागमें पीड़ा होती है और भोजनके पच जानेपर पीड़ा शान्त हो जाती है। मूत्रसे वायुके आवृत हो जानेपर मूत्रका निकलना बंद हो जाता है और वस्ति-स्थानमें वेदना होने लगती है। वायुके द्वारा पुरीषके आवृत होनेपर गुह्यभागमें विशेष प्रकारका विबन्ध हो जाता है। आरेसे काटनेपर होनेवाली पीड़ाके समान रोगीको पीड़ा होती है। ऐसे वातरक्त-दोषके आवरण-रोगमें ज्वरसे पीड़ित रोगी यथाशीघ्र धराशायी होकर मूर्च्छित हो जाता है। विबन्धद्वारा मल