गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
पीड़ित होकर सूखा हुआ बड़ी कठिनतासे और बहुत देरमें निकलता है।
वायुद्वारा सभी धातुओंके आवृत्त होनेपर रोगीके कटि-प्रदेश, वंक्षण और पीठमें पीड़ा होती है। विलोम भावको प्राप्त हुआ वायु रोगीके हृदयको पीड़ित करता है। पित्तज दोषसे प्राणवायुके आवृत्त होनेपर भ्रम, मूर्च्छा, पीड़ा तथा दाहका उपद्रव रोगीके शरीरमें होता है।
पित्तसे व्यानवायुके आक्रान्त होनेपर पीड़ा, तन्द्रा, स्वरभ्रंश और सम्पूर्ण शरीरमें दाहकी उत्पत्ति होती है। समानवायुके आवृत्त होनेपर क्रमशः अङ्गचेष्टा, अङ्गभङ्ग, वेदनासहित संताप, तापविनाश, पसीना, रूक्षता और तृष्णाका उपद्रव होता है। अपानवायुके आवृत्त होनेसे रोगीके शरीरमें दाह होता है और उसके मलका वर्ण हल्दीके समान पीला हो जाता है। स्त्रियोंमें रजवृद्धि (या रोगवृद्धि), ताप, आनाह तथा प्रमेह नामक रोग भी उसके शरीरमें जन्म ग्रहण कर लेते हैं।
श्लेष्मके द्वारा प्राणवायुके आवृत्त होनेपर नादस्रोतमें अवरोध, खखार, स्वेद, श्वास तथा निःश्वास—इनमें विविधता होती है। उदानवायुके कफसे आवृत्त होनेपर शरीरमें भारीपन, अरुचि, वाकरोध, स्वरक्षय, बल और वर्णका नाश होता है। व्यानवायुके कफसे आवृत्त होनेपर पर्व और अस्थियोंमें जकड़न, सम्पूर्ण शरीरमें भारीपन, अत्यधिक स्थूलता आ जाती है। समानवायुके कफसे आवृत्त होनेपर कर्मेन्द्रियोंमें अज्ञानता, शरीरमें पसीनेकी कमी, अग्निमन्दता तथा अपानवायुके कफसे आवृत्त होनेपर मल-मूत्रकी अधिक प्रवृत्ति होती है।
इस प्रकार वातरक्त-रोग बाईस प्रकारका माना गया है। क्रमशः प्राणादि वायु परस्पर आक्रान्त होनेसे बीस प्रकारके आवरण होते हैं। प्राणवायु जब अपानवायुको आवृत्त कर लेता है, तब उबकाई, श्वासरोध, प्रतिश्याय, शिरोग्रह, हृदयरोग और मुखशोष—ये उपद्रव होते हैं। उदानवायुके द्वारा प्राणवायुके आवृत्त होनेपर रोगीकी शक्तिका विनाश होता है। वैद्यको यथोचित विचार करके ही सभी प्रकारके वात-आवरणोंके भेदोंको जानना चाहिये। सभी वात-दोषोंके स्थानोंकी विवेचना करके उसके दुष्ट कर्मोंकी वृद्धि और हानिपर चिन्तन करके भी आवरणोंका विभाग समझना चाहिये।
प्राणादिक पाँचों वायु-समूहोंके (पृथक्-पृथक्) पित्त-दोषजन्य आवरण होते हैं। वातमिश्रित पित्तादिके जिन निवास-स्थानोंकी चर्चा ऊपर की गयी है, वे उन्हीं अपने दोषोंसे मिश्रित हैं। मिश्रित पित्तादिक दोषोंके कारण वे भी अनेक प्रकारके आवरण रोग माने गये हैं। अतः विद्वान् चिकित्सक सचेत होकर अपने लक्षण-ज्ञानके अनुसार उन दोषोंका चिन्तन करे। चिकित्सकके लिये अपेक्षित है कि धीरे-धीरे अपने लक्षणोंके अभ्युदयसे निश्चित एवं दृढ़ हुए उन रोगोंका बार-बार परीक्षण करके ही उपचार करे।
प्राणवायु प्राणीके जीवनका आधार तथा उदानवायु बलका आधार कहा गया है। शरीरमें उन दोनोंके पीड़ित होनेसे प्राणीके आयु और बल दोनोंकी हानि होती है।
आवृत्त हुए सभी वायु-दोष अपने-अपने लक्षणोंसे शरीरपर स्पष्ट हो गये हों अथवा स्पष्ट न हुए हों या वे स्थानच्युत होनेके कारण समझसे परे हो रहे हों अथवा उपद्रवविहीन हो गये हों, वे असाध्य ही होते हैं। चिकित्सकके द्वारा किये जानेवाले प्रयाससे भी वे कष्ट-साध्य ही होते हैं।
उपर्युक्त उन आवृत्त वायु-दोषोंकी उपेक्षा करनेसे प्राणियोंके शरीरमें विद्रधि, प्लीहा, हृद्रोग, गुल्म तथा अग्निमन्दता आदिके उपद्रवोंका आविर्भाव होता है।