भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] नेत्र, नाक, मुख, गला, अनिद्रा तथा पादरोग और शस्त्राघातादिजनित रोगोंकी चिकित्सा ३३१

आमके गुठलीकी मज्जा तथा आँवलाके चूर्णका सिरमें लेप करनेसे केशराशि जड़से मजबूत, सघन, लम्बी, चिकनी तथा टूट-टूटकर न झरनेवाली हो जाती है।

विडंग और गन्धक अथवा चार गुने गोमूत्रसे युक्त मैनसिलके चूर्णसे सिद्ध तैलपाक उत्तम माना गया है। सिरमें इन तेलोंका लेप करनेसे जूँ और लीख समाप्त हो जाते हैं।

हे वृषभध्वज ! शंखभस्म और सीसक घिसकर सिरमें लगानेसे केश चिकने और अत्यन्त काले हो जाते हैं। भृंगराज, लौहचूर्ण, त्रिफला, बिजौरा नींबू, नीली, कनेर और गुड़को समान भागमें लेकर अग्निपर सिद्ध किया गया पाक एक महौषधि है। इसके लेपसे पक रहे बालोंको पुनः काला किया जा सकता है। आमकी गुठलियोंकी गूदी, त्रिफला, नीली, भृंगराज, शोधित पुराना लौहचूर्ण तथा कांजीका सिद्ध योग भी बालोंको काला करता है।

चक्रमर्दक (चकवड़)-का बीज एवं कुष्ठ एरण्डमूल तथा अत्यन्त खट्टे कांजीके साथ पीसकर लेप करनेसे मस्तकका रोग दूर हो जाता है।

सेंधा नमक, वच, हींग, कुष्ठ, नागकेशर, शतपुष्पा (सौंफ) तथा देवदारु नामक औषधियोंसे शोधित चार गुने गायके गोबरसे निकाले गये रससे युक्त तिलके तेलको एक कण मात्र भी कानमें डालकर अत्यन्त प्रबल कर्णशूलको विनष्ट किया जा सकता है। हे शिव ! भेंड़का मूत्र और सेंधा नमक कानमें डालनेसे पूतिका-दोष अर्थात् बहनेवाला दुर्गन्धपूर्ण पानी और कृमिस्रावादिका विकार विनष्ट हो जाता है। मालती नामक पुष्पकी पत्तियोंका रस या गोमूत्रकानोंमें डालनेसे उनमेंसे बहनेवाला मवाद नष्ट हो जाता है।

कुष्ठ, उड़द, काली मिर्च, तगर, मधु, पिप्पली, अपामार्ग, अश्वगन्धा, बृहती, श्वेत सरसों, यव, तिल और सेंधा नमकका उबटन कल्याणकारी होता है। भल्लातक, बृहती एवं अनारका छिलका तथा कटु तैलके लेपसे या इस उबटनके प्रयोगसे लिंग, बाहु, स्तन और श्रवणशक्तिकी वृद्धि होती है। (अध्याय १७६)


नेत्र, नाक, मुख, गला, अनिद्रा तथा पादरोग और शस्त्राघातादिजनित रोगोंकी चिकित्सा

श्रीहरिने कहा—हे शंकर ! मधुके सहित शोभनक वृक्षकी पत्तियोंका रस आँखोंमें डालनेसे निश्चित ही नेत्रका रोग नष्ट हो जाता है। तिल और चमेलीके अस्सी-अस्सी फूल, नीम, आँवला, सोंठ, पीपल तथा चौलाईके शाकको चावलके जलमें पीसकर उनकी वटी बनानी चाहिये। तदनन्तर छायामें सुखाकर मधुके साथ उसका नेत्रोंमें अंजन करना लाभकारी है। ऐसा करनेसे तिमिरादिक रोग नष्ट हो जाते हैं। बहेड़ेके गुठलीकी गूदी, शंखनाभि, मैनसिल, नीमकी पत्ती एवं काली मिर्चको बकरीके मूत्रमें घिसकर अंजन बनाना चाहिये। इस प्रकारका सिद्ध अंजन नेत्रोंमें होनेवाले पुष्प-दोष अर्थात् फुल्ला, रतौंधी, तिमिर-विकार तथा पटलरोगको नष्ट कर देता है।

शंखभस्म चार भाग, मैनसिल दो भाग एवं सेंधा नमक एक भाग जलमें पीसकर बनायी और छायामें सुखायी गयी वटीका नेत्रोंमें अंजन करनेसे तिमिर, पटल तथा सूजन नष्ट हो जाता है। यह नेत्ररोगोंकी महौषधि है। त्रिकटु, त्रिफला, कंजाके फल, सेंधा नमक और दोनों रजनी, हल्दी,