गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३३२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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दारुहल्दीको भृंगराजके रसमें पीसकर उसका नेत्रोंमें अंजन देनेसे तिमिरादिक सभी रोग दूर हो जाते हैं। जंगली अडूसाकी जड़को कांजीमें पीसकर नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रशूल नष्ट होता है। तक्र अर्थात् मट्ठेके साथ बेरकी जड़को पीसकर पीनेसे भी नेत्रोंकी पीड़ा दूर होती है। सेंधा नमक, कड़ुआ तेल, अपामार्गकी जड़, दूध और कांजीको ताम्रपात्रमें घिसकर उसका नेत्रोंमें अंजन करनेसे पिंजट अर्थात् कीचड़ निकलना बंद हो जाता है।
बिल्व और नील-वृक्षकी जड़ पीसकर बनाये गये अंजनको नेत्रोंमें लगाने मात्रसे तिमिरादिक रोग निश्चित ही नष्ट हो जाते हैं। पिप्पली, तगर, हल्दी, आँवला, वच और खदिरद्वारा बनायी गयी बत्तीका अंजन लगानेसे नेत्ररोग नष्ट होता है। जो मनुष्य नित्य प्रातः मुँहमें जल भरकर जलका ही छींटा देकर नेत्रोंको धोता है, वह नेत्रोंके सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है।
श्वेत एरण्डकी जड़ एवं पत्तियोंके रससे सिद्ध बकरीके दूधके उष्णपाकके सेंकसे आँखोंका वात-विकार दूर हो जाता है। चन्दन, सेंधा नमक, पुराने पलाशका पत्र और हरीतकी पटल, कुसुम, नीलीका अंजन चक्रिका (चकाचौंधी) नामक नेत्ररोगोंका विनाशक है।
बकरीके मूत्रमें घिसी गयी गुंजाकी जड़का अंजन तिमिररोगको दूर करता है। हे रुद्र! चाँदी, ताँबे तथा सोनेकी शलाकाको हाथपर घिसकर नेत्रोंमें उसका लगाया गया उबटन कामला नामक रोगका निवारक है। घोषाफल अर्थात् सौंफको सूँघने और सेवन करनेसे पीलिया नामक रोगका विनाश होता है।
दूर्वा, अनारपुष्प, लोध्र और हरीतकीका रस नाशार्श तथा वातरक्तके दोषको दूर करता है। हे वृषध्वज! हे नीललोहित! जाङ्गलिकमूल अर्थात् केवाँचकी जड़को भली प्रकारसे पीसकर उसका नस्य लेनेसे नाशार्श-रोग नष्ट हो जाता है। हे रुद्र! गोघृत, सर्जरस (राल), धनिया, सेंधा नमक, धतूर तथा गैरिकसे सिद्ध सिक्थ अर्थात् मोम तेलमें मिलाकर ओठोंपर लगानेसे ओठोंके घाव तथा ओठ फटनेका रोग दूर हो जाता है। चबाकर सेवन की जानेवाली चमेलीकी पत्तियोंका रस भी मुखरोग-विनाशक है।
केसरके बीजोंको खानेसे हिलनेवाले दाँत दृढ़ हो जाते हैं। मुष्टक (मोथा), कुष्ठ, इलायची, मुलेठी, वालक और धनियाको चबानेसे मुखकी दुर्गन्ध दूर हो जाती है। कषाय द्रव्य या त्रिकटु अथवा तेलयुक्त तिक्त शाकके नित्य भक्षणसे भी मुखकी दुर्गन्ध दूर हो जाती है। इससे सभी प्रकारके दाँतोंसे सम्बन्धित घाव भी नष्ट हो जाते हैं। हे शिव! तेलमें सिद्ध कांजीका कुल्ला करनेसे अथवा उसको मुखमें रखनेसे ताम्बूलके साथ खाये गये चूनेके प्रभावसे हुए घाव या अन्य व्याधियोंका विनाश हो जाता है।
सोंठको चबानेसे जिस प्रकार प्राणी कफके रोगसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार बिजौरा नींबूके बीज, इलायची, मुलेठी, पिप्पली और चमेलीकी पत्तियोंका चूर्ण (शहदमें) चाटनेसे भी कफ-विकारसे मुक्ति मिल जाती है। शेफालिका (सिन्धुवार) तथा जटामांसीका चूर्ण चबानेसे गलशुण्डि अर्थात् तालुभागकी शोथका विनाश होता है।
गुंजा अर्थात् घुँघचीकी जड़को चबानेसे दाँतमें लगे हुए कीड़ोंका विनाश होता है। हे शिव! मधुसहित काकजंघा (घुँघची), स्नुही (सेंहुड़) और नीलका क्वाथ, दन्ताक्रान्त (दन्ताघात) तथा दाँतके कीट-रोगोंका विनाशक है।
कर्कटपाद (कमलकी जड़)-से सिद्ध घृतपाकका