गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मोम, गुड़, गैरिक, गुग्गुल और रालका रस पैरोंमें लेप करनेसे उनका फटना तथा जलना बंद हो जाता है।
हे वृषध्वज! सरसोंके तेलको पैरोंमें लेपकर निर्धूम अग्निमें जो मनुष्य सेंकता है, उसका पंकिल—मिट्टी खाया हुआ अर्थात् कीचड़में अधिक देरतक रहनेसे दूषित हुआ या उसके समान अन्य किसी कारणसे विकृत हुआ पैर खुजलाहट आदि विकारोंसे रहित हो जाता है।
सर्जरस, मोम, जीरा और हरीतकीसे शोधित घृतपाकका अभ्यङ्ग करनेसे अग्निमें जलनेसे उत्पन्न हुई पीड़ा शान्त हो जाती है। तिलका तेल अग्निमें जलाकर भस्म किये गये यवको प्रचुर मात्रामें बार-बार मिलाकर लेप करनेसे अग्निमें जलनेके कारण उत्पन्न हुए घाव ठीक हो जाते हैं। भैंसके दूधका मक्खन, अग्निमें भूने गये तिलका चूर्ण और भिलावाका रस मिलाकर तैयार किया गया लेप घावको ठीक करता है। इसका नस्य एवं लेप करनेसे हृदय-शूल भी शान्त हो जाता है।
हे हर! दण्ड-प्रहार आदिके कारण शरीरमें उत्पन्न घाव कर्पूर और गोघृत परस्पर मिलाकर भरनेसे ठीक हो जाता है। हे शिव! शस्त्रोंके प्रहारसे होनेवाले घावपर इस औषधिका प्रयोग करके उसे स्वच्छ सफेद कपड़ेसे बाँध देना चाहिये। हे वृषध्वज! इस प्रकारके घाव जब पक रहे हों या उनमें पीड़ा होती हो तो उन्हें हाथका स्पर्श देना (सहलाना) चाहिये। आम्रकी जड़का रस और घृत भरनेसे भी शस्त्राघातका घाव भर जाता है। शरपुंखा (शरफोंका), लज्जालुका (लाजवन्ती) और पाठा (पाढ़ा) नामक औषधियोंकी जड़को जलमें पीसकर उसका लेप लगानेसे भी शस्त्राघातजनित व्रण ठीक हो जाता है। काकजंघाकी जड़को पीसकर शस्त्राघातके घावमें भरनेसे वह घाव तीन रात्रियोंके बीतते ही सूख जाता है। रोहितक नामक या रोहड़ाकी जड़का लेप भी व्रणको नष्ट कर देता है।
लाठी आदिके प्रहारसे उत्पन्न होनेवाली पीड़ा जल एवं तिलके तेलमें सिद्ध अपामार्गकी जड़का लेप लगानेसे तथा आगपर सेंकनेसे शान्त हो जाती है।
हे शंकर! हरीतकी, सोंठ और सेंधा नमक पीसकर जलके साथ खानेसे अजीर्ण रोगका विनाश होता है।
निम्बमूल अर्थात् नीमकी जड़को कमरमें बाँधनेपर नेत्रोंकी पीड़ा दूर हो जाती है। शण (पटसन)-की जड़ और पानका भस्म इन्द्रियजन्य विकारका विनाशक है। यवादिक अन्न, हल्दी, सफेद सरसोंकी जड़ और बिजौरा नीबूके बीज समान भागमें पीसकर इनका उबटन बनाना चाहिये। सात दिनोंतक शरीरमें इसका प्रयोग करनेसे रंग गोरा हो जाता है।
श्वेत अपराजिताकी पत्ती तथा नीमकी पत्तीका रस निकालकर उसका नस्य देनेसे डाकिनी आदि माताओं और ब्रह्मराक्षसोंकी छायासे मुक्ति हो जाती है। हे वृषध्वज ! मधुसार अर्थात् मुलेठीकी जड़का नस्य देनेसे भी उनकी छाया दूर हो जाती है।
हे रुद्र! पिप्पली, लौहचूर्ण, सोंठ, आँवला, सेंधा नमक, मधु तथा शर्कराका समान योग गूलरके फलके बराबरकी मात्रामें एक सप्ताहपर्यन्त सेवन करनेसे पुरुष बलवान् हो जाता है। यदि वह सदैव इसका सेवन करे तो दो सौ वर्षतक जीवित रहता है।
भल्लूकीके दूधसे भावित रोहित मछलीके मांसद्वारा सिद्ध तैलपाकका अभ्यङ्ग करनेसे शरीरमें स्थित समस्त रोग दूर हो जाते हैं।
चन्दनके जलका नस्य लेनेसे शरीरके गिरे हुए रोम पुनः निकल आते हैं।
हस्त नक्षत्रमें लाङ्गलिककन्द अर्थात् कलियारी