गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] गर्भ-सम्बन्धी रोग, दन्त तथा कर्णशूल एवं रोमशमन आदिका उपचार ३३५
या जलपिप्पलीकी जड़को लेकर जो व्यक्ति उसका लेप शरीरमें लगाता है, वह बुढ़ौतीके दर्पको नष्ट कर देता है अर्थात् शरीरमें वृद्धावस्थाका प्रभाव नहीं पड़ता।
पुष्य नक्षत्रमें सुदर्शना (चक्रांगी या वृषकणीं) नामक लताकी जड़को लाकर घरके मध्य डाल देनेसे सर्प घरसे भाग जाते हैं। हे शिव! रविवारको लायी गयी मन्दारवृक्ष तथा अग्नइज्वलिता (जलपिप्पली)-की जड़को पीसकर बनायी गयी बत्ती, सरसोंके तेलसे जलानेपर मार्गमें दंश-प्रहार करनेवाले सर्पका विनाश करती है।
विफला (केतकी) और अर्जुनके पुष्प, भिलावा, शिरीष, लाक्षारस, राल, विड और गुग्गुल—इन सभीके द्वारा बना धूप मक्खियों तथा मच्छरोंका नाश करता है। (अध्याय १७७)
गर्भ-सम्बन्धी रोग, दन्त तथा कर्णशूल एवं रोमशमन आदिका उपचार
श्रीहरिने कहा—हे शिव! मुलेठी तथा कण्टकारी नामक औषधियोंको समभागमें लेकर गोदुग्धमें पाक तैयार करके दूधका चौथा भाग शेष रहनेपर उस पाकको गरम जलके साथ पान करनेपर स्त्रीको गर्भ रुक जाता है। बिजौरा नींबूके बीजोंको दूधके साथ भावित करके उसका पान करनेसे स्त्रीको गर्भ रुकता है। पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छुक स्त्रियोंको बिजौरा नींबूके बीज तथा एरण्ड-वृक्षकी जड़को घीके साथ संयोजित करके उसका सेवन करना चाहिये। अश्वगन्धाके क्वाथका दूध एवं घीके साथ सेवन पुत्रकारक है। पलाशके बीजोंको मधुके साथ पीसकर पान करनेसे रजस्वला स्त्री मासिक धर्म तथा गर्भधारणसे रहित हो जाती है।
हरिताल, यवक्षार, पत्राङ्ग (तेजपत्ता), लाल चन्दन, जातिफल (जायफल), हींग तथा लाक्षारसका पाक तैयार करके उसे दाँतोंमें भलीभाँति लगाना चाहिये। किंतु उससे पहले हरीतकीके क्वाथसे दाँतोंको साफ कर ले। ऐसा करनेसे मनुष्यके लाल पड़ गये दाँत भी सफेद हो जाते हैं।
मन्द-मन्द आँचपर मूलीके रसको पकाकर उसको कानमें डालनेसे कर्णस्राव अर्थात् कानका बहना बंद हो जाता है। अर्कके पत्तोंको लेकर मन्द-मन्द आँचपर गरम कर ले। तदनन्तर उसका रस निचोड़कर कानोंमें डाले तो कर्णशूल विनष्ट हो जाता है।
प्रियंगु, मुलेठी, आँवला, कमल, मंजीठ, लोध्र, लाक्षारस और कपित्थ-रससे बने तैलपाकसे स्त्रियोंका योनि-दोष दूर हो जाता है। सूखी मूली तथा सोंठका क्षार और हींग तो इस रोगके लिये महौषधि है। सोया (वनसौंफ), वचा (वच), कूट, हल्दी, सहिजन, रसाञ्जन, काला नमक, यवक्षार, सर्जक (तालवृक्षका रस), सेंधा नमक, पिप्पली, विडंग तथा मोथा—इन सभी औषधियोंको समान भागमें लेकर उनसे चार गुना मधु, बिजौरा नींबू और केलाका रस एकत्र करे। तदनन्तर इन सभी औषधियोंको एकमें मिलाकर उनसे तिलके तेलकी सिद्धि करे। इस प्रकार तैयार किये गये पाकके प्रयोगसे निश्चित ही स्त्रियोंका स्रावादिक रोग दूर हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।
सरसोंका तेल कानमें डालनेसे उसके अंदर उत्पन्न हुए कृमि नष्ट हो जाते हैं। हे रुद्र! हल्दी,