भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४४संक्षिप्त गरुड़पुराण[ आचार-

पटल आदि नेत्ररोग, गुल्म, दन्तकृमि, विविध ज्वर तथा विषदोष-शमनके उपाय

श्रीहरिने कहा— हे नीललोहित! श्वेत अपराजिता-पुष्पके रसको नेत्रोंमें डालनेसे पटल नामक नेत्ररोग नष्ट हो जाता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। हे सुरासुरविमर्दन शिव! गोखरूकी जड़ चबाकर दाँतोंमें लगे हुए कीटोंकी व्यथाको दूर किया जा सकता है।

यदि ऋतुकालमें उपवासपूर्वक स्त्री गोदुग्धके साथ मन्दारवृक्षकी जड़को पीसकर पान करती है तो उसके शरीरमें होनेवाला गुल्म और शूलविकार विनष्ट हो जाता है।

हे हर! पलाश अथवा अपामार्गकी जड़ हाथमें बाँधनेपर सभी प्रकारके ज्वरोंका विनाश होता है तथा भूत-प्रेत आदिके द्वारा उत्पन्न होनेवाला कष्ट भी नहीं होता। हे परमेश्वर! वृश्चिकमूल अर्थात् बिछिया-वृक्षकी जड़को बासी जलके साथ पीसकर प्रातःकाल सेवन करनेसे दाहज्वर दूर किया जा सकता है। इसकी जड़को शिखामें बाँधनेसे एकाहिक आदि जो ज्वर हैं, वे भी विनष्ट हो जाते हैं। उस जड़को बासी जलके साथ पीसकर पीनेसे सभी प्रकारका विषदोष विनष्ट हो जाता है।

जो मनुष्य पाढ़ा (पाठा)-की जड़को पीसकर गोघृतके साथ पान करता है, उसका सभी प्रकारका विषदोष दूर हो जाता है। रक्तवर्णवाले चित्रक वृक्षकी जड़को पीसकर कानोंमें डालनेसे कामला रोग विनष्ट हो जाता है, इसमें शंका नहीं है।

श्वेत कोकिलाक्ष (श्वेत तालमखाना)-की जड़को पीसकर बकरीके दूधमें तीन सप्ताहतक पान करनेसे क्षय रोग विनष्ट हो जाता है। नारियल-वृक्षके पुष्पको बकरीके दूधमें मिलाकर पान करनेसे तीनों प्रकारका रक्तवात-विकार नष्ट हो जाता है।

सुदर्शन-वृक्षकी जड़को मालाके मध्य पिरोकर कण्ठमें धारण करनेसे त्र्याहिक (तिजरिया) आदि ज्वर तथा ग्रह एवं भूतादिक व्याधियाँ विनष्ट हो जाती हैं।

हे रुद्र! श्वेत गुञ्जा-वृक्षके पुष्प तथा मूलको लेकर अपने मुखमें रखनेसे नाना प्रकारके विषोंका विनाश हो जाता है। इस औषधिकी जड़को हाथ और कण्ठमें धारण करनेपर ग्रहादिक दोष दूर होता है। हे नीललोहित! कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको लायी गयी इस औषधिकी जड़को कटिप्रदेशमें बाँधकर सिंह आदि हिंसक पशुओंके भयको दूर किया जा सकता है।

हे ईश! विष्णुकान्ता (अपराजिता)-की जड़को रेशमी सूतमें बाँधकर कानमें धारण करनेसे मगरमच्छादिक जन्तुओंका भय नहीं रहता।

(अध्याय १८९)


गण्डमाला, प्लीहा, विद्रधि, कुष्ठ, दद्रु, सिध्म, पीनस तथा छर्दि आदि विविध रोगोंका उपचार और सुगन्धित द्रव्योंके निर्माणकी विधि

श्रीहरिने कहा— हे ईश्वर! गोमूत्रके साथ अपराजिताकी जड़ पीनेसे गण्डमाला रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। इन्द्रवारुणीकी भी जड़ पीनेसे इस रोगका विनाश होता है। जिङ्गणी (मंजीठ), एरण्ड तथा शूकशिम्बी (केवाँच)-को मिलाकर शीतल जलयुक्त लेप लगानेसे भुजाओंमें