भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 355

काण्ड ] गण्डमाला, प्लीहा, विद्रधि, कुष्ठ, दद्रु, सिध्म, पीनस तथा छर्दि आदि विविध रोगोंका उपचार ३४५

होनेवाली व्यथा और गर्दनकी व्यथा दूर हो जाती है।

भैंसका मक्खन, अश्वगन्धा, पिप्पली, वचा (वच) और दोनों प्रकारका कूट एकमें मिलाकर बनाया गया लेप लिङ्गस्रोत तथा स्तनगत दुःखोंका विनाशक है।

कूट और नागबलाके चूर्णको मक्खनमें मिलाकर सिद्ध किया गया लेप युवतियोंके वक्षःस्थलको सुडौल, ओजगुणसे सम्पन्न तथा सुन्दर बनाता है।

इन्द्रवारुणीकी जड़ उखाड़कर रोगीका नाम लेकर दूरसे ही उसके प्रति फेंक दिया जाय तो रोगीका प्लीहा रोग दूर हो जाता है।

चावलके धोवनमें श्वेत पुनर्नवाकी जड़ पीसकर पीनेसे निश्चित ही विद्रधि रोग नष्ट हो जाता है। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। केलेका पत्ता और यवक्षार जलमें सिद्ध करके तैयार किया गया पेय पीनेसे उदरजनित समस्त विकार दूर हो जाते हैं। केलेकी जड़ गुड़ और घीमें मिलाकर, अग्निपर पकाकर खाया जाय तो वह उदरजनित कृमियोंको विनष्ट कर देता है।

प्रतिदिन प्रातःकाल आँवले और नीमकी पत्तियोंका चूर्ण भक्षण करनेसे कुष्ठ रोग दूर हो जाता है। हरीतकी, विडंग, हल्दी, श्वेत सरसों, सोमलताकी जड़, कंजेकी जड़ और सेंधा नमकको गोमूत्रमें पीसकर एक सिद्ध-योग बनाना चाहिये। ये सभी औषधियाँ कुष्ठ रोगको दूर करनेवाली हैं।

एक भाग त्रिफला, दो भाग हरीतकी और सोमलताके बीजोंको खाना चाहिये। इस पथ्यसे दद्रु रोग नष्ट हो जाता है। गोमूत्र और नमकसे युक्त खट्टे मट्ठेका क्वाथ बनाकर उसको काँसेके पात्रमें घिसकर लेप करनेसे कुष्ठ और दद्रु दोनोंका विनाश होता है। हल्दी, हरिताल, दूर्वा, गोमूत्र तथा सेंधा नमक मिलाकर तैयार किया गया लेप दद्रु, पामा और गर नामक रोगको दूर करता है।

हे रुद्र ! सोमलताके बीजोंका चूर्ण और मक्खनका मधुके साथ सेवन करना चाहिये। ये औषधियाँ श्वेत कुष्ठ रोगका विनाश करनेवाली हैं। इनके प्रयोगमें मट्ठेके साथ चावल आदिका भोजन पथ्य है। हे हर ! श्वेत अपराजिताकी जड़को उसीके रसके साथ पीसकर किया गया उसका लेप एक मासमें श्वेत कुष्ठको विनष्ट कर देता है।

हे वृषभध्वज ! पामा और दुर्नामा नामक कुष्ठका विनाश काली मिर्च और सिन्दूरसे युक्त भैंसके मक्खनका लेप लगानेसे होता है।

हे ईश्वर ! श्वेत गम्भारी (शतावरी)-की जड़का गोदुग्धके साथ पाक सिद्ध करके उसको खाना चाहिये। यह पाक शुक्लपित्त रोगका विनाशक है। हे रुद्र ! मूलीके बीजोंको अपामार्गकी जड़के रसमें मिलाकर लगाये गये लेपसे सिध्म रोग विनष्ट होता है। केलेका क्षार और हल्दीका लेप भी सिध्म रोगका विनाशक है। हे महादेव ! केला और अपामार्गका क्षार एरण्ड तेलमें मिलाकर उस लेपका अभ्यङ्ग (मालिश) करनेसे तत्काल सिध्म रोग नष्ट हो जाता है।

हे वृषभध्वज ! गोमूत्रसे युक्त कूष्माण्ड (कुम्हड़ा)-के नालका क्षार और जलमें पीसी गयी हल्दीको भैंसके गोबरमें मिलाकर मन्द-मन्द आँचपर सिद्ध करना चाहिये, उसका उबटन लगानेसे शरीरका सौन्दर्य बढ़ जाता है। तिल, सरसों, दारुहल्दी, हल्दी और कूट नामक जो औषधियाँ हैं, उनका उबटन बनाकर जो पुरुष अपने शरीरमें लगाता है, वह दुर्गन्धसे रहित होकर सुगन्धित हो उठता है। दूर्वा, काकजंघा, अर्जुनके पुष्प, जामुनकी पत्तियाँ तथा लोध्र-पुष्प—इन सभीको एकमें मिलाकर पीस लेना चाहिये। इसका प्रतिदिन प्रयोग करनेसे शरीरकी दुर्गन्ध दूर हो जाती है और वह मनोहर हो जाता है। लोध्र-पुष्प तथा जलमें पीसकर तैयार