भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ]
व्याधिहर वैष्णव कवच
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सर्वव्यापी, जनार्दन, देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुको प्रणाम करके मैं रक्षाके निमित्त अमोघ अप्रतिम वैष्णव कवचको धारण करता हूँ। जो सभी दुःखोंका निवारण करनेवाला और सर्वस्व है, वह कवच इस प्रकार है* —

भगवान् विष्णु मेरी आगेसे रक्षा करें। कृष्ण मेरी पीछेसे रक्षा करें। हरि मेरे सिरकी रक्षा करें। जनार्दन हृदयकी रक्षा करें। मेरे मनकी रक्षा हृषीकेश और जिह्वाकी रक्षा केशव करें। वासुदेव दोनों नेत्रोंकी तथा संकर्षण (बलराम) दोनों कानोंकी रक्षा करें। प्रद्युम्न मेरे नाककी, अनिरुद्ध शरीरके चर्मभागकी रक्षा करें। भगवान्‌की वनमाला मेरे कण्ठप्रदेशके नीचे अन्तःकरणतक और उनका श्रीवत्स मेरे अधोभागकी रक्षा करे। दैत्योंका निवारण करनेवाला चक्र मेरे वामपार्श्वकी रक्षा करे। समस्त असुरोंका निवारण करनेवाली गदा मेरे दक्षिण पार्श्वकी रक्षा करे। मेरे उदरभागकी रक्षा मुसल और पृष्ठभागकी रक्षा लाङ्गल (हल) करे। मेरे ऊर्ध्वभागकी रक्षा शार्ङ्ग नामक धनुष तथा मेरे दोनों जंघा-प्रदेशोंकी रक्षा नन्दक नामक तलवार करे। मेरे पार्ष्णिभागकी रक्षा शंख और दोनों पैरोंकी रक्षा पद्म करे। गरुड सदैव मेरे सभी कार्योंके अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये रक्षा करते रहें। भगवान् वराह जलमें, भगवान् वामन विषम परिस्थितिमें, भगवान् नरसिंह वनमें और भगवान् केशव सब ओरसे मेरी रक्षा करते रहें।

हिरण्यगर्भभगवान् मुझे हिरण्य अर्थात् स्वर्णकी राशि प्रदान करें। सांख्यदर्शनके आचार्य भगवान् कपिल मुनि मेरे शरीरमें स्थित सभी प्रकारके धातुओंमें समानता बनाये रखें। श्वेतद्वीपमें निवास करनेवाले भगवान् अजन्मा विष्णु मुझको भी श्वेतद्वीपमें ले चलें। मधुकैटभका मर्दन करनेवाले विष्णु मेरे सभी शत्रुओंका विनाश करें। मेरे शरीरमें विद्यमान समस्त पापोंको खींच-खींचकर सदैव


* विष्णुर्मामग्रतः पातु कृष्णो रक्षतु पृष्ठतः। हरिर्मे रक्षतु शिरो हृदयं च जनार्दनः॥
मनो मम हृषीकेशो जिह्वां रक्षतु केशवः। पातु नेत्रे वासुदेवः श्रोत्रे सङ्कर्षणो विभुः॥
प्रद्युम्नः पातु मे घ्राणमनिरुद्धस्तु चर्म च। वनमाला गलस्यान्तं श्रीवत्सो रक्षतादधः॥
पार्श्वं रक्षतु मे चक्रं वामं दैत्यनिवारणम्। दक्षिणं तु गदा देवी सर्वसुरनिवारिणी॥
उदरं मुसलं पातु पृष्ठं मे पातु लाङ्गलम्। ऊर्ध्वं रक्षतु मे शार्ङ्गं जङ्घे रक्षतु नन्दकः॥
पार्ष्णी रक्षतु शङ्खश्च पद्मं मे चरणवुभौ। सर्वकार्यार्थसिद्धयर्थं पातु मां गरुडः सदा॥
वराहो रक्षतु जले विषमेषु च वामनः। अटव्यां नरसिंहश्च सर्वतः पातु केशवः॥
हिरण्यगर्भो भगवान् हिरण्यं मे प्रयच्छतु। सांख्याचार्यस्तु कपिलो धातुसाम्यं करोतु मे॥
श्वेतद्वीपनिवासी च श्वेतद्वीपं नयत्वजः। सर्वान् सूदयतां शत्रून् मधुकैटभमर्दनः॥
सदाकर्षतु विष्णुश्च किल्बिषं मम विग्रहात्। हंसो मत्स्यस्तथा कूर्मः पातु मां सर्वतो दिशम्॥
त्रिविक्रमस्तु मे देवः सर्वपापानि कृन्ततु। तथा नारायणो देवो बुद्धिं पालयतां मम॥
शेषो मे निर्मलं ज्ञानं करोत्वज्ञाननाशनम्। वडवामुखो नाशयतां कल्मषं यत्कृतं मया॥
पद्भ्यां ददातु परमं सुखं मूर्ध्नि मम प्रभुः। दत्तात्रेयः प्रकुरुतां सपुत्रपशुबान्धवम्॥
सर्वानरीन् नाशयतु रामः परशुना मम। रक्षोघ्नस्तु दाशरथिः पातु नित्यं महाभुजः॥
शत्रून् हलेन मे हन्याद्रामो यादवन्दनः। प्रलम्बकेशिशाणूरपूतनाकंसनाशनः।
कृष्णस्य यो बालभावः स मे कामान् प्रयच्छतु॥
अन्धकारतमोघोरं पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्। पश्यामि भयसंत्रस्तः पाशहस्तमिवान्तकम्॥
ततोऽहं पुण्डरीकाक्षमच्युतं शरणं गतः। धन्योऽहं निर्भयो नित्यं यस्य मे भगवान् हरिः॥
ध्यात्वा नारायणं देवं सर्वोपद्रवनाशनम्। वैष्णवं कवचं बद्ध्वा विचरामि महीतले॥
अप्रधृष्योऽस्मि भूतानां सर्वदेवमयो ह्यहम्। स्मरणाद्देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः॥ (१९४।४—२२)