भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भगवान् विष्णु विनष्ट करते रहें। हंसावतार, मत्स्यावतार तथा कूर्मावतार धारण करनेवाले विष्णु सभी दिशाओंमें मेरी रक्षा करें। भगवान् त्रिविक्रमदेव मेरे समस्त पापोंको काट डालें। भगवान् नारायणदेव मेरी बुद्धिका विकास करें। शेषनारायण मेरे ज्ञानको निर्मल बनायें तथा अज्ञानका विनाश करें। मैंने जो कुछ भी पाप किया है, उस समस्त पापको भगवान् वडवामुख हयग्रीव विनष्ट करें।

भगवान् विष्णु मेरे दोनों पैरोंको और सिरको सुख प्रदान करें। भगवान् दत्तात्रेय मुझे पुत्र और बन्धु-बान्धव तथा पशुओंसे सम्पन्न रखें। भगवान् जामदग्न्य—परशुराम अपने परशुसे मेरे सभी शत्रुओंका विनाश करें। राक्षसोंके निहन्ता दशरथसुत आजानुभुज भगवान् श्रीराम मेरी नित्य रक्षा करें। यादवनन्दन बलराम अपने हलसे मेरे शत्रुओंका विनाश करें। प्रलम्ब, केशी, चाणूर, पूतना तथा कंसका संहार करनेवाला जो बालभाव भगवान् कृष्णका है, वही मेरे समस्त मनोरथोंको पूर्ण करे।

हे देव! मैं अन्धकारके समान तमोगुणसे सम्पन्न, हाथमें पाश धारण करनेवाले यमराजके सदृश काले-पीले वर्णवाले भयंकर पुरुषको देख रहा हूँ, उसके भयसे मैं संत्रस्त हो गया हूँ। हे पुण्डरीकाक्ष भगवान् अच्युत! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आपके इस आश्रयसे मैं धन्य हो उठा हूँ। आपकी शरण ग्रहण करनेसे अब मुझे कोई भय नहीं रह गया है, अतः मैं नित्य निर्भय हो गया हूँ।

समस्त सांसारिक उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाले भगवान् नारायणदेवका ध्यान करके वैष्णव कवचसे आबद्ध मैं पृथ्वीतलपर विचरण करता हूँ। इसीके प्रभावसे मैं सभी प्राणियोंके लिये अजेय हो गया हूँ। इतना ही नहीं, सर्वदेवमय भी हो गया हूँ। अपरिमित तेजसे सम्पन्न देवाधिदेव भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे मेरा समस्त मनोरथ नित्य सिद्ध होता रहे।

भगवान् वासुदेवके चक्रमें जो अरे लगे हैं, वे यथाशीघ्र मेरे समस्त पापोंका विनाश करें और मेरी हिंसा करनेवाले शत्रुओंका संहार करें।

राक्षस एवं पिशाचोंसे तथा गहन वन, प्रान्त, विवाद, राजमार्ग, द्यूतक्रीड़ा, लड़ाई, झगड़ा, नदी पार करनेकी स्थिति, आपत्काल, प्राणोंका संकट-काल, अग्निभय, चौरभय, ग्रहबाधा, विद्युत्-उत्पीड़न, सर्पविषका उद्वेग, रोग, विघ्न, संकट आनेपर तथा भयविह्वल होनेपर इसका जप तो करना ही चाहिये, किंतु नित्य इसका जप करना विशेष लाभप्रद है। यह भगवान् विष्णुका मन्त्ररूपी कवच परम श्रेष्ठ तथा सभी पापोंका विनाशक है।
(अध्याय १९४)


सर्वकामप्रदा विद्या

श्रीहरिने कहा— हे शिव! अब मैं 'सर्वकामप्रदा विद्या' का वर्णन करता हूँ, उसे सुनें। इसकी उपासना मात्र सात रात करनेसे ही सभी कामनाएँ सफल हो जाती हैं। सर्वकामप्रदा विद्या इस प्रकार है*—

हे भगवान् वासुदेव! आपका मैं ध्यान करता


* सर्वकामप्रदां विद्यां सप्तरात्रेण तां शृणु। नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि॥
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च। नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये॥
आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये। त्वद्रूपाणि च सर्वाणि तस्मात्तुभ्यं नमो नमः॥
हृषीकेशाय महते नमस्तेऽनन्तमूर्तये। यस्मिन्निदं यतश्चैतत् तिष्ठत्यग्रेऽपि जायते॥
मृण्मयीं वहसि क्षोणीं तस्मै ते ब्रह्मणे नमः। यन्न स्पृशन्ति न विदुः मनोबुद्धीन्द्रियासवः।
अन्तर्बहिश्च त्वं चरसि व्योमतुल्यं नमाम्यहम्॥
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाभूतपतये सकलसत्त्वभाविव्रीडनिकरकमलरेणूपलनिभधर्माख्यविद्यया चरणारविन्दयुगल परमेष्ठिन् नमस्ते। अवाप विद्याधरतां चित्रकेतुश्च विद्यया॥ (१९५। १—६)

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