गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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विष्णुधर्माख्यविद्या
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हूँ, आपको नमस्कार है। हे प्रद्युम्न! हे अनिरुद्ध! हे संकर्षण! आपको नमस्कार है। हे परमानन्दस्वरूप! आप मात्र अनुभवजन्य हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप आत्माराम एवं शान्तमूर्ति हैं तथा द्वैत-दृष्टिसे परे हैं, आपको मेरा नमस्कार है। यह समस्त चराचर जगत् आपका ही रूप है, आपको बारंबार प्रणाम है। हे अनन्तमूर्ति भगवान् हृषीकेश! आप महत्त्वस्वरूपको नमस्कार है। प्रलयकालमें यह सारा जगत् जिस मूर्तिमें प्रविष्ट होकर स्थित रहता है और पुनः प्रलयकालके पश्चात् सृष्टिके प्रारम्भमें सबसे पहले उत्पन्न भी होता है तथा जो इस मृण्मयी पृथ्वीको धारण करता है, उस ब्रह्मदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। जिस देवको स्पर्श करने और पहचाननेमें न मन-बुद्धि समर्थ हैं, न ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय और प्राण समर्थ हैं तथा आकाशके समान जो देव समस्त चराचर प्राणियोंके अंदर और बाहर विचरण करते हैं, ऐसे व्योमस्वरूप आप (देव)-को मैं नमस्कार करता हूँ। हे पञ्चभूतोंके स्वामी ऐश्वर्यमूर्ति महापुरुष भगवान् वासुदेव! आपको नमस्कार है। हे परमेष्ठिन्! आपसे सकल सत्त्वोंकी उत्पत्ति होती है तथा आपके चरणारविन्दयुगल मानो शील-समूहरूपी कमलोंकी धर्माख्यविद्यारूप रेणूत्पल हैं, आपको नमस्कार है। चित्रकेतुने इस विद्याके द्वारा विद्याधरत्वको प्राप्त किया था। (अध्याय १९५)
विष्णुधर्माख्यविद्या
श्रीहरिने कहा—हे महेश्वर! जिस 'विष्णुधर्म' नामक विद्याका जप करके देवराज इन्द्रने समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्तकर इन्द्रत्व-पद प्राप्त किया था, उस विद्याको कहता हूँ।
इस विद्याके जपसे पूर्व दोनों पैर, दोनों जानु, दोनों जंघा-प्रदेश, उदर, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और शिरोभागमें ॐकारादि वर्णोंसे यथाक्रम न्यास करना चाहिये। 'नमो नारायणाय' इस मन्त्रद्वारा विपरीत-क्रमसे भी न्यास करे। तदनन्तर द्वादशाक्षर-मन्त्र ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय')-के आदि वर्ण ॐकारसे करन्यास करे। अन्तिम यकारसे अंगुष्ठ आदि अँगुलियोंकी पर्वसंधियोंमें न्यास करके हृदयमें ॐकारका न्यास करना चाहिये। सम्पूर्ण मन्त्रसे मस्तक-भागमें न्यास करे। मूर्धासे प्रारम्भ करके भ्रुवोंके मध्य-भागमें ॐकार-मन्त्रसे न्यास करके शिखा तथा नेत्रादिमें 'ॐ विष्णवे नमः' इस मन्त्रसे न्यास करना चाहिये। अनन्तर अन्तरात्मामें उन परम शक्तियोंसे सम्पन्न परमात्मा शेषनारायणका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—
मम रक्षां हरिः कुर्यान्मत्स्यमूर्तिर्जलेऽवतु ॥
त्रिविक्रमस्तथाकाशे स्थले रक्षतु वामनः।
अटव्यां नरसिंहस्तु रामो रक्षतु पर्वते ॥
भूमौ रक्षतु वराहो व्योम्नि नारायणोऽवतु।
कर्मबन्धाच्च कपिलो दत्तो रोगाच्च रक्षतु ॥
हयग्रीवो देवताभ्यः कुमारो मकरध्वजात्।
नारदोऽन्यर्चनार्नादेवः कूर्मो वै नैर्ऋते सदा ॥
धन्वन्तरिश्चापथ्याच्च नागः क्रोधवशात् किल।
यज्ञो रोगात् समस्ताच्च व्यासोऽज्ञानाच्च रक्षतु ॥
बुद्धः पाषण्डसंघातात् कल्की रक्षतु कल्मषात्।
पायान्मध्यन्दिने विष्णुः प्रातर्नारायणोऽवतु ॥
मधुहा चापराह्ने च सायं रक्षतु माधवः।
हृषीकेशः प्रदोषेऽव्यात् प्रत्यूषेऽव्याज्जनार्दनः ॥
श्रीधरोऽव्यादर्थरात्रे पद्मनाभो निशीथके।
चक्रकौमोदकीबाणा घ्नन्तु शत्रूंश्च राक्षसान् ॥
शंखः पद्मं च शत्रुभ्यः शार्ङ्गं वै गरुडस्तथा।
बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् पान्तु पार्श्वविभूषणः ॥
शेषः सर्पस्वरूपश्च सदा सर्वत्र पातु माम्।
विदिक्षु दिक्षु च सदा नरसिंहश्च रक्षतु ॥
एतद्धारयमाणश्च यं यं पश्यति चक्षुषा।
स वशी स्याद्विपाप्मा च रोगमुक्तो दिवं व्रजेत् ॥
(१९६।६–१६)