गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
भगवान् हरि मेरी रक्षा करें। मत्स्यमूर्ति भगवान् जलमें मेरी रक्षा करें। भगवान् त्रिविक्रम आकाशमें और भगवान् वामन स्थलमें मेरी रक्षा करें। वन-प्रान्तमें भगवान् नरसिंह, पर्वतभागमें जामदग्न्य-परशुराम मेरी रक्षा करें। भूमिपर भगवान् वराह, व्योममें भगवान् नारायण मेरी रक्षा करें। कर्मोंके बन्धनसे भगवान् कपिल तथा रोगोंके प्रकोपसे भगवान् दत्तात्रेय मेरी रक्षा करें। भगवान् हयग्रीव देवताओंसे, कुमार कामदेवसे मेरी रक्षा करें। भगवान् नारद अन्य देवोंकी उपासनासे और भगवान् कूर्मदेव नैर्ऋतमें सदैव मेरी रक्षा करें। भगवान् धन्वन्तरि अपथ्य-सेवनसे, भगवान् शेषनाग क्रोधसे, भगवान् यज्ञदेव समस्त रोग-समुदायसे और भगवान् व्यास अज्ञानसे मेरी रक्षा करें। भगवान् बुद्ध पाखण्ड-समूहसे एवं भगवान् कल्किदेव पापसे मेरी रक्षा करें। भगवान् विष्णु मध्याह्नकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् नारायण प्रातःकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् मधुसूदन अपराह्नकाल और भगवान् माधव सायंकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् हृषीकेश प्रदोषकालमें तथा भगवान् जनार्दन प्रत्यूषकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् श्रीधर अर्धरात्रि तथा भगवान् पद्मनाभ निशीथकालमें मेरी रक्षा करें। हे भगवन्! आपका सुदर्शन, कौमोदकी गदा और बाण मेरे शत्रुओं तथा राक्षसादिका संहार करे। आपका शंख, पद्म, शार्ङ्ग धनुष तथा वाहन गरुड भी शत्रुओंसे मेरी रक्षा करें। भगवान् वासुदेवके संनिकट स्थित अलंकारस्वरूप सभी पार्षद मेरे बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राणोंकी रक्षा करें। सर्पका रूप धारण करनेवाले भगवान् शेषनारायण सदैव सर्वत्र मेरी रक्षा करें। भगवान् नरसिंह सदैव सभी दिशाओं और विदिशाओंमें मेरी रक्षा करें।
इस प्रकार जो व्यक्ति इस विष्णुधर्माख्यविद्याको धारण करता है, वह अपने नेत्रोंसे जिस-जिसको देखता है वह उसीके वशमें हो जाता है और सभी पापोंसे मुक्त तथा रोगरहित होकर वह स्वर्गलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १९६)
विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन
धन्वन्तरिने कहा—अब मैं गरुडके द्वारा कही गयी गारुडी विद्याका वर्णन करता हूँ। इस विद्याको सुमित्रने कश्यपमुनिसे कहा था। यह विद्या सभी प्रकारके विषोंका अपहारक है।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच तत्त्व हैं। इन पाँचों तत्त्वोंके पृथक्-पृथक् मण्डल होते हैं तथा उन-उन मण्डलोंके अधिष्ठाता ये पृथ्वी आदि देवता ही माने गये हैं। अन्य देवता भी इन मण्डलोंमें स्थित रहते हैं। इनके पृथक्-पृथक् मन्त्र भी हैं। इन मण्डलाधिपति देवताओंके मन्त्रोंका यथाविधि न्यासपूर्वक जप करनेसे अभीष्ट-सिद्धि होती है और विष-बाधा दूर हो जाती है।
साधकको चाहिये कि वह पृथक्-पृथक् पाँचों मण्डलोंके स्वरूप तथा उनके अधिष्ठातृ देवोंका ध्यान करे। मण्डलोंका स्वरूप इस प्रकार है—पृथ्वीमण्डल चौकोर, फैला हुआ, चारों ओर मुखवाला तथा पीले वर्णका कहा गया है तथा यह मण्डल इन्द्रदेवतापरक है। वरुणमण्डल (जलमण्डल) पद्माकार तथा अर्धचन्द्रयुक्त है। इन्द्रनीलमणिके समान कान्तिवाले, सौम्यस्वरूप, स्वस्तिकसे युक्त, त्रिकोण आकारवाले अग्निमण्डलमें ज्वालामालाओंसे समन्वित अग्निका ध्यान करना चाहिये। विभिन्न