गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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व्याकरण-निरूपण
कुमारने कहा— हे कात्यायन! अब मैं संक्षेपमें व्याकरणके विषयमें बतला रहा हूँ। यह व्याकरणसे सिद्ध शब्दोंके ज्ञानके लिये तथा बालकोंकी व्युत्पत्ति-प्रक्रिया बढ़ानेके लिये है।
सुबन्त और तिङन्त—ये दो प्रकारके पद होते हैं। सुप् प्रत्यय सात विभक्तियोंमें बँटे हैं। सु, औ, जस्—यह प्रथमा विभक्ति है। प्रथमा विभक्ति प्रातिपदिकार्थमें, सम्बोधन-अर्थमें, लिङ्गादि-बोधक-अर्थमें तथा कर्मके उक्त होनेपर कर्मवाचक-पदसे और कर्ताके उक्त होनेपर कर्तृवाचक-पदसे होती है। धातु और प्रत्ययसे भिन्न अर्थवान् शब्दस्वरूपकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है। अम्, औट्, शस्—यह द्वितीया विभक्ति है। द्वितीया विभक्ति कर्म-अर्थमें होती है। अन्तरा, अन्तरेण पदोंके योगमें भी द्वितीया विभक्ति होती है। टा, भ्याम्, भिस्—यह तृतीया विभक्ति है। तृतीया विभक्ति करण और कर्ता-अर्थमें होती है। क्रिया (फल)-की सिद्धिमें अत्यन्त उपकारक कारककी करण संज्ञा होती है। क्रियाके प्रधान आश्रयको कर्ता कहते हैं। ङे, भ्याम्, भ्यस्—यह चतुर्थी विभक्ति है। चतुर्थी विभक्ति सम्प्रदान कारकके अर्थमें होती है। रुच्यर्थक धातुके योगमें तृप्त होनेवालेकी, ण्यन्त धृ धातुके प्रयोगमें उत्तमर्णकी एवं दानके उद्देश्यकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। ङसि, भ्याम्, भ्यस्—यह पञ्चमी विभक्ति है। पञ्चमी विभक्ति अपादान कारकके अर्थमें होती है। जिससे पृथक् हुआ जाता है, जिससे लिया जाता है, जिसके समीपसे लिया जाता है या जो भयका हेतु होता है, उसकी अपादान संज्ञा होती है। ङस्, ओस् और आम्—यह षष्ठी विभक्ति है। यह विभक्ति मुख्यरूपसे स्व-स्वामिभाव-सम्बन्धमें होती है। वस्तुतः सम्बन्ध सामान्य षष्ठीका अर्थ है। [ इस सम्बन्धमें 'एकशतं षष्ठ्यर्थाः' (षष्ठी विभक्तिके सौ अर्थ होते हैं) यह भाष्य अनुसंधेय है।] ङि, ओस्, सुप्—यह सप्तमी विभक्ति है। सप्तमी विभक्ति अधिकरण-अर्थमें हुआ करती है। आधारकी अधिकरण संज्ञा होती है। आधार औपश्लेषिक, वैषयिक और अभिव्यापक-भेदसे तीन प्रकारका होता है। वारणार्थक धातुके योगमें ईप्सित और अनीप्सितकी भी अपादान संज्ञा होती है। वारणार्थक धातुके प्रयोगमें जो ईप्सित अभीष्ट हो उसकी अपादान संज्ञा होती है तथा अनीप्सित (अनीच्छित)-की कर्म संज्ञा होती है। कर्मप्रवचनीयसंज्ञक परि, अप्, आङ् के योगमें तथा इतर, ऋते (बिना) अन्य-दिक् (दिशा)-वाचक शब्दका योग होनेपर पञ्चमी विभक्ति होती है। प्रत्ययान्तके एन योगमें द्वितीया विभक्ति होती है। कर्मप्रवचनीय-संज्ञक पदोंके योगमें भी द्वितीया विभक्ति होती है। लक्षण-अर्थमें, इत्थम्भूत तथा आख्यान-अर्थमें और वीप्सा-अर्थमें प्रति, परि, अनुकी कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। हीन-अर्थमें अनुकी अधिक अर्थमें उप उपसर्गकी कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। अध्ववाचक-शब्दके कर्ममें और गत्यर्थक धातुके कर्ममें द्वितीया तथा चेष्टा-अर्थमें चतुर्थी विभक्ति होती है। दिवादिगणमें पठित मन् धातुके कर्ममें अनादरके तात्पर्यसे अप्राणिवाचक पदमें द्वितीया और चतुर्थी विभक्ति होती है।
नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् और वषट्का योग होनेपर तथा तादर्थ्यके योगमें चतुर्थी विभक्ति होती है। भाववाची तदर्थसे विहित तुमुन् प्रत्ययान्तसे चतुर्थी होती है।
सह शब्दसे युक्त और विकृत-अङ्गवाचक शब्दमें तृतीया विभक्ति होती है। कालार्थक तथा