गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] | व्याकरणसार | ३६७
भावार्थक शब्दोंमें सप्तमी विभक्तिके प्रयोगका विधान है, किंतु षष्ठी विभक्तिका भी प्रयोग इन अर्थोंमें किया जाता है। स्वामी, ईश्वर, अधिपति, साक्षी, दायाद, प्रतिभू और प्रसूत—इन शब्दोंके योगमें षष्ठी एवं सप्तमी विभक्ति होती है। निर्धारण-अर्थमें षष्ठी तथा सप्तमी दोनों विभक्ति होती है। हेतुवाचक शब्दके प्रयोगमें हेतुद्योत्य होनेपर मात्र षष्ठी विभक्ति होती है।
स्मरणार्थक धातुके कर्ममें और प्रतियत्नार्थक कृ धातुके कर्ममें तथा शेषत्वकी विवक्षामें षष्ठी विभक्ति ही होती है। हिंसार्थक जास्, नि पूर्वक और प्र पूर्वक हन् आदि और नाट्, क्राथ् एवं पिष् धातुओंके कर्ममें शेषत्वकी विवक्षामें षष्ठी होती है तथा कृदन्त पदादिके योगमें कर्तृकर्मवाचक-पदसे षष्ठी होती है। निष्ठाप्रत्ययान्तके योगमें कर्तृकर्मवाचक-पदसे षष्ठी विभक्ति नहीं होती।
प्रातिपदिक नाम और नामधातु—इन दो भागोंमें विभक्त हो जाता है। भू आदि धातुओंसे लट् आदि दस लकार होते हैं, जिनके स्थानपर तिङ् प्रत्यय हुआ करते हैं। तिप्, तस्, झि प्रथमपुरुष है। सिप्, थस्, थ मध्यमपुरुष-संज्ञक प्रत्यय हैं और मिप्, वस्, मस् उत्तमपुरुष-संज्ञक प्रत्यय हैं। इन प्रत्ययोंकी परस्मैपद संज्ञा होती है। आत्मनेपदसंज्ञक प्रत्यय त, आताम्, झ की प्रथमपुरुष संज्ञा तथा थास्, आथाम्, ध्वम् की मध्यमपुरुष संज्ञा और इट्, वहिङ्, महिङ् की उत्तमपुरुष संज्ञा होती है। ये परस्मैपद एवं आत्मनेपद प्रत्यय णिच् आदि प्रत्ययोंकी भाँति धातुसे विहित होते हैं।
युष्मद् और अस्मद्से अतिरिक्त क्रियाका कर्ता होनेपर धातुसे प्रथमपुरुष-संज्ञक प्रत्यय होते हैं। कर्ताके रूपमें युष्मद् शब्दका प्रयोग होनेपर मध्यमपुरुष और कर्ताके रूपमें अस्मद् शब्दका प्रयोग होनेपर उत्तमपुरुष होता है। भू आदिकी धातु संज्ञा होती है। सन्, क्यच्, काम्यच् आदि प्रत्यय जिसके अन्तमें हों उनकी भी धातु संज्ञा होती है। लट् लकारका प्रयोग वर्तमान कालके लिये होता है तथा 'स्म'का योग हो जानेपर वही क्रिया भूतकालिक हो जाती है। लिट् भूतकाल (परोक्ष)-के लिये प्रयोज्य है। अनद्यतन भूतके अर्थमें लङ् लकार होता है। आज्ञा तथा आशीर्वादकी क्रियाके निमित्त लोट् आदि लकारोंका प्रयोग होता है। विधि आदि अर्थमें भी लोट्का प्रयोग हो सकता है। विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रश्न तथा प्रार्थनाके अर्थमें जो लिङ् होता है, उसे विधिलिङ् तथा आशीर्वादके अर्थमें जो लिङ् होता है उसे आशीर्लिङ् कहते हैं। भविष्य (सामान्य)-में लृट् लकार होता है और अनद्यतन भविष्यमें लुट् लकार होता है। हेतुहेतुमद्भावके विषयमें क्रियाकी अनिष्पत्ति गम्यमान हो तो भविष्य और भूत-अर्थोंमें लृङ् लकार होता है। लिङ् के अर्थमें लेट् लकार होता है, किंतु इसका प्रयोग केवल वेदमें होता है।
लकार सकर्मक धातुसे कर्ता या कर्म-अर्थमें तथा अकर्मक धातुसे भाव या कर्ता-अर्थमें होते हैं। कृत्संज्ञक प्रत्यय कर्ता अथवा कर्म अथवा भाव-अर्थमें होते हैं। इसी प्रकार तव्यत् आदि कृत्-संज्ञक प्रत्यय तथा अनीयर्, तृच् आदि प्रत्यय होते हैं।
(अध्याय २०५)
व्याकरणसार
**सूतजीने कहा—**हे विप्रो! अब मैं संहिता आदिसे युक्त सिद्ध शब्दोंको बतलाने जा रहा हूँ। आप उसे सुनें—सागता, वीदं, सूत्तमम्, पितृर्षभ, लृकार—इन पदोंमें दीर्घ सन्धि है। लांगलीषा, मनीषा—यहाँ पररूप सन्धि है। इसी प्रकार गंगोदकम् (यहाँ गुण हुआ है।) तवल्कारः (यहाँ गुण),