गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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चारों चरणोंमें पाँचवीं तथा आठवीं मात्रा (लकार) लघु होती है, उसका नाम विश्लोक है। जिस मात्रासमकके चरणमें बारहवाँ लकार अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है, किसीसे मिलता नहीं, उसका नाम वानवासिका है। जिसके चारों चरणोंमें पाँचवीं, आठवीं तथा नवीं मात्रा (लकार) लघु होती है तो उसे चित्रा कहा जाता है।
उपर्युक्त सममात्रिक, विश्लोक, वानवासिका, चित्रा तथा उपचित्रा* नामके छन्दोंमें जिस किसी भी छन्दके एक-एक चरणको लेकर उससे चार चरणोंवाले अन्य छन्दकी रचना की जाय, उसे पादाकुलक छन्द कहते हैं।
यदि इसी सोलह मात्राओंवाले छन्दके प्रत्येक पादमें लघु मात्राओंका प्रयोग हो और वे किसीसे मिलकर दीर्घ न हो गयी हों तो उसे वृत्तमात्रा छन्द कहते हैं। जब इन्हीं छन्दोंके अनुसार पूर्वार्द्ध भागमें लघु-ही-लघु और उत्तरार्द्ध भागमें गुरु-ही-गुरु वर्ण या मात्राएँ होती हैं तो उसे ज्योति छन्द कहते हैं। जब इस छन्दके विपरीत पूर्वार्द्ध भागमें सब वर्ण या मात्राएँ गुरु हों और उसके उत्तरार्द्ध भागमें सब लघु हों तो उसे सौम्या छन्द कहा जाता है।
जिस छन्दके पूर्वार्द्धमें अट्ठाईस लघु तथा एक गुरु और उत्तरार्द्धमें तीस लघु एवं एक गुरु मात्रा हो, उसे शिखा कहते हैं। यदि छन्दमें यही क्रम विपरीत होता है, अर्थात् पूर्वार्द्धमें तीस लघु, एक गुरु और उत्तरार्द्धमें अट्ठाईस लघु, एक गुरुकी मात्रा होती है तो उसे खञ्जा कहा जाता है। जिस मात्रासमक छन्दके पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्द्धमें क्रमशः सत्ताईस-सत्ताईस लघु मात्राएँ और एक-एक गुरु मात्रा होती है, उसे रुचिरा कहते हैं। (अध्याय २०८)
छन्द-विधान (समवृत्तलक्षण)
श्रीसूतजीने कहा—हे विप्रो! एक गुरु (S) तथा दो गुरु (SS)-से पृथक्-पृथक् बने हुए छन्दोंको क्रमशः श्री या उक्था स्त्री या अत्युक्था के नामसे अभिहित किया गया है। एक मात्र मगण (SSS)-से बने हुए छन्दको 'नारी', एक रगण (SIS)-से बने हुए छन्दको मध्या और एक मगण (SSS) तथा एक गुरु (S)-से बने हुए छन्दको कन्या कहते हैं। ये प्रतिष्ठा छन्दके भेद हैं। भगण (SII) और दो गुरु (SS)-से युक्त छन्दका नाम पङ्क्ति है। यह सुप्रतिष्ठाका भेद है। तगण (SSI) एवं यगण (ISS)-से संयुक्त छन्दका नाम तनुमध्या है। नगण (III) और यगण (ISS)-से बने हुए छन्दको बालललिता कहा जाता है। ये छः वर्णवाले गायत्री छन्दके भेद हैं।
मगण (SSS), सगण (IIS) और एक गुरु (S)-से बने हुए छन्दको मदलेखा कहते हैं। विद्वानोंने इसे उष्णिक् का भेद स्वीकार किया है। जिस छन्दके चारों पादमें दो भगण (SII, SII) और दो गुरु (SS) हों, वह चित्रपदा के नामसे प्रसिद्ध है। जिस छन्दके चारों चरण दो मगण (SSS, SSS) एवं दो गुरु (SS)-से संयुक्त होते हैं, वह विद्युन्माला नामक छन्द है। जिस छन्दके प्रत्येक पादमें भगण (SII), तगण (SSI), एक लघु (I) और एक गुरु (S) हो, उसे माणवक कहते हैं। जिसके चारों चरणोंमें समान रूपसे मगण (SSS), नगण (III) तथा दो गुरु (SS) होते हैं, उसे हंसरुत नामक छन्द माना गया है। जिसके चारों चरण एक रगण (SIS), एक जगण
* जहाँ नवां लकार दसवेंके साथ मिलकर गुरु हो जाता है, वहाँ उपचित्रा नामक छन्द होता है।