गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 383, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] छन्द-विधान ( समवृत्तलक्षण ) ३७३
( । ऽ ।), एक गुरु ( ऽ) तथा एक लघु (।)-से संयुक्त होते हैं, वह समानिका नामका छन्द है और जिसके प्रत्येक चरणमें एक जगण ( । ऽ ।), एक रगण ( ऽ । ऽ), एक लघु ( । ) तथा एक गुरु ( ऽ ) होता है, उसका नाम प्रमाणिका है। इन दोनोंसे भिन्न जो छन्द होता है, उसको वितान के नामसे जानना चाहिये। ये सब आठ वर्णोंके चरणवाले अनुष्टुप् छन्दके भेद हैं।
रगण ( ऽ । ऽ), नगण ( । । ।) और सगण ( । । ऽ)-से जिस छन्दका प्रत्येक चरण समन्वित होता है, उसका नाम हलमुखी है। जो छन्द प्रत्येक पादमें दो नगण ( । । ।, । । ।) और एक मगण ( ऽ ऽ ऽ)-से संयुक्त रहता है, उसे शिशुभृता कहते हैं। ये नौ वर्णोंके चरणवाले बृहती छन्दके भेद हैं। जो अपने चारों चरणोंमें समान रूपसे सगण ( । । ऽ), मगण ( ऽ ऽ ऽ), जगण ( । ऽ ।) और एक गुरु ( ऽ)-से युक्त है, उस छन्दको विराजिता कहते हैं। प्रत्येक पादमें मगण ( ऽ ऽ ऽ), नगण ( । । ।), यगण ( । ऽ ऽ) और एक गुरु ( ऽ)-से पूर्ण छन्दका नाम पणव है। मयूरसारिणी नामक छन्दके चारों चरणोंमें समान रूपसे एक रगण ( ऽ । ऽ), एक जगण ( । ऽ ।), एक रगण ( ऽ । ऽ) एवं एक गुरु ( ऽ) होता है। रुक्मवती छन्दके प्रत्येक पादमें एक भगण ( ऽ । ।), एक मगण ( ऽ ऽ ऽ) , एक सगण ( । । ऽ) और एक गुरु ( ऽ)-का विधान है। जिस छन्दके सभी चरणोंमें मगण ( ऽ ऽ ऽ), भगण ( ऽ । ।), सगण ( । । ऽ) और एक गुरु ( ऽ) होता है, उसका नाम मत्ता है। जिसके प्रत्येक चरणमें नगण ( । । ।), रगण ( ऽ । ऽ), जगण ( । ऽ ।) तथा एक गुरु ( ऽ) है, उसे मनोरमा कहा गया है। ये सभी दस वर्णोंवाले पङ्क्ति छन्दके भेद हैं।
जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें दो तगण ( ऽ ऽ ।, ऽ ऽ ।), एक जगण ( । ऽ ।), दो गुरु ( ऽ ऽ) होते हैं, उसे इन्द्रवज्रा कहते हैं और जिस छन्दमें क्रमशः एक जगण ( । ऽ । ), एक तगण ( ऽ ऽ ।), एक जगण ( । ऽ ।) एवं दो गुरु ( ऽ ऽ) हों, उसका नाम उपेन्द्रवज्रा है। जब एक ही छन्दमें ये दोनों इन्द्रवज्रा तथा उपेन्द्रवज्रा छन्द सम्मिलित रहते हैं, तो उसे उपजाति कहा जाता है। इनके अनेक भेद हैं। यथा—
सुमुखी नामक छन्दके प्रत्येक चरणमें एक नगण ( । । ।), दो जगण ( । ऽ ।, । ऽ ।), एक लघु ( । ) और एक गुरु ( ऽ) होता है। दोधक में तीन भगण ( ऽ । ।, ऽ । ।, ऽ । ।) और दो गुरु ( ऽ ऽ) होते हैं। शालिनी नामक जो छन्द है उसके सभी चरणोंमें एक मगण ( ऽ ऽ ऽ), दो तगण ( ऽ ऽ ।, ऽ ऽ ।) एवं दो गुरुओं ( ऽ ऽ) की युति होती है। इसके प्रत्येक चरणमें चौथे तथा सातवें अक्षरपर विराम होता है। वातोर्मी छन्दके प्रत्येक चरणमें दो मगण ( ऽ ऽ ऽ, ऽ ऽ ऽ), एक तगण ( ऽ ऽ ।) होता है और उसके बाद दो गुरु ( ऽ ऽ) होते हैं। इसमें भी चार, सातपर विराम होता है।
जो छन्द प्रत्येक चरणमें मगण ( ऽ ऽ ऽ), भगण ( ऽ । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), एक लघु ( । ) और एक गुरु ( ऽ)-से युक्त हो, उसे भ्रमरविलासिता नामक छन्द कहा गया है। रथोद्धता छन्द अपने सभी चरणोंमें एक रगण ( ऽ । ऽ), नगण ( । । ।), रगण ( ऽ । ऽ), एक लघु ( । ) एवं एक गुरु ( ऽ)-से संयुक्त होता है। स्वागता के प्रत्येक पादमें एक रगण ( ऽ । ऽ), एक नगण ( । । ।), एक भगण ( ऽ । ।) और दो गुरु ( ऽ ऽ) होते हैं। वृत्ता नामक छन्दके प्रत्येक पादमें दो नगण ( । । ।, । । ।), एक सगण ( । । ऽ) और दो गुरु ( ऽ ऽ) सन्निहित होते हैं। समद्रिका छन्दमें दो नगण ( । । ।, । । ।), एक रगण ( ऽ । ऽ), एक