भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 384

३७४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

लघु (। ) तथा एक गुरु (ऽ) होता है। जिस छन्दके प्रत्येक चरण रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), एक लघु (। ) तथा एक गुरु (ऽ)-से युक्त हों, वह श्येनिका नामक छन्द है। जहाँ सभी चारों चरणोंमें एक जगण (।ऽ।), एक सगण (।।ऽ), एक तगण (ऽऽ।), दो गुरु (ऽऽ) हों तो वहाँ शिखण्डित छन्द होता है। महात्मा पिङ्गलने इन्हें त्रिष्टुप्-छन्दका भेद बताया है।

जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें एक रगण (ऽ।ऽ), एक नगण (।।।), एक भगण (ऽ।।), एक सगण (।।ऽ) हो, उसका नाम चन्द्रवर्त्म और जिसमें एक जगण (।ऽ।), एक तगण (ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।), एक रगण (ऽ।ऽ) हो, उसका नाम वंशस्थ छन्द है। जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।) हो, उसे इन्द्रवंशा और जिसमें चार सगण-ही-सगण (।।ऽ, ।।ऽ, ।।ऽ, ।।ऽ) होते हैं, उसे तोटक छन्द माना गया है। जिसके प्रत्येक पादमें नगण (।।।), दो भगण (ऽ।।, ऽ।।) और रगण (ऽ।ऽ) हो, उसका नाम द्रुतविलम्बित है।

जो छन्द अपने सभी चारों चरणोंमें दो नगण (।।।, ।।।), एक मगण (ऽऽऽ), एक यगण (।ऽऽ)-से संयुक्त रहता है, उसका नाम पुट है। इस छन्दमें आठ और चार वर्णोंपर यति होती है। दो नगण (।।।, ।।।) और दो रगण (ऽ।ऽ, ऽ।ऽ)-से समन्वित प्रत्येक चरणवाला जो छन्द है, उसका नाम मुदितवदना है। इसमें सात और पाँच वर्णोंपर यति होती है। जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), यगण (।ऽऽ), नगण (।।।), यगण (।ऽऽ) हो, उस छन्दको कुसुमविचित्रा कहते हैं। जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ)-से युक्त प्रत्येक पादवाले छन्दका नाम जलोद्धतगति है। प्रत्येक पादमें चार रगण (ऽ।ऽ, ऽ।ऽ, ऽ।ऽ, ऽ।ऽ)-से युक्त छन्द स्रग्विणी माना गया है। चार-चार यगणों (।ऽऽ, ।ऽऽ, ।ऽऽ, ।ऽऽ)-से जिसके सभी चरण संयुक्त हैं, उसको भुजङ्गप्रयात छन्दकी संज्ञा दी गयी है। प्रियंवदा छन्द नगण (।।।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।) और रगण (ऽ।ऽ)—इन चार गणोंसे युक्त होता है।

मणिमाला नामक जो छन्द है, उसके प्रत्येक पादमें तगण (ऽऽ।), यगण (।ऽऽ), तगण (ऽऽ।) तथा यगण (।ऽऽ) होता है। जिस छन्दके प्रत्येक पादमें तगण (ऽऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।) और रगण (ऽ।ऽ) हो तो उसका नाम ललिता है। इस छन्दमें छठे वर्णपर यति होती है। प्रमिताक्षरा वृत्त सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), सगण (।।ऽ)-से युक्त होता है। उज्ज्वला छन्दमें नगण (।।।), नगण (।।।), भगण (ऽ।।) तथा रगण (ऽ।ऽ) होते हैं। जो छन्द मगण (ऽऽऽ), मगण (ऽऽऽ), यगण (।ऽऽ), यगण (।ऽऽ)-से संयुक्त है, उसका नाम वैश्वदेवी है। इसमें पाँच और सात वर्णोंपर यति होती है। जब छन्दके प्रत्येक चरणमें मगण (ऽऽऽ), भगण (ऽ।।), सगण (।।ऽ) और मगण (ऽऽऽ) हो तो उसे जलधरमाला कहते हैं। चन्द्रवर्त्म छन्दसे यहाँतक बारह वर्णवाले जगती छन्दके भेद हैं।

जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), नगण (।।।), तगण (ऽऽ।), तगण (ऽऽ।) और एक गुरु (ऽ) हो, तो उसका नाम क्षमावृत्त है। इसमें सात और छः वर्णोंपर यति होती है। प्रहर्षिणी नामक छन्द मगण (ऽऽऽ), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) एवं एक गुरु (ऽ)-से युक्त होता है। इसके प्रत्येक चरणमें तीन और दस वर्णपर यतिका विधान है। जो छन्द जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), सगण (।।ऽ),