गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 385, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] \hfill छन्द-विधान ( समवृत्तलक्षण ) \hfill ३७५
जगण (।ऽ।) और एक गुरु (ऽ)-से सन्निहित होता है, उसको रुचिरा कहा गया है। इसमें यति चार तथा नौ वर्णोंपर होती है। मत्तमयूर नामक छन्दको मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), यगण (।ऽऽ), सगण (।।ऽ) और एक गुरु (ऽ)-से युक्त माना गया है। इसके प्रत्येक पादमें चार तथा नौ वर्णोंपर यति होती है।
मञ्जुभाषिणी छन्दके प्रत्येक चरणमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु (ऽ) होता है। सुनन्दिनी नामक छन्दके प्रत्येक चरणमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ) होते ही हैं, किंतु अन्तिम जगणके स्थानपर इसमें मगण (ऽऽऽ) होता है। अन्तमें एक गुरु (ऽ) रहता है और जो छन्द नगण (।।।), नगण (।।।), तगण (ऽऽ।), तगण (ऽऽ।) तथा एक गुरु (ऽ)-से युक्त है, उसका नाम चन्द्रिका है। इसमें सात और छः वर्णोंपर यति होती है। ये तेरह वर्णवाले अतिजगती छन्दके अवान्तर भेद हैं।
मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), नगण (।।।), सगण (।।ऽ) और दो गुरु (ऽ ऽ)-से युक्त छन्दको असम्बाधा कहते हैं, इसमें पाँच और नौ वर्णोंपर यति होती है। जिस छन्दमें नगण (।।।), नगण (।।।), रगण (ऽ।ऽ), सगण (।।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ) हो, उसे अपराजिता छन्द कहा गया है। इसमें सात-सात वर्णोंपर यति होती है। यदि प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), नगण (।।।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), एक लघु (।) तथा एक गुरु (ऽ) हो, तो उसे प्रहरणकलिका के नामसे जाना जाता है। इसमें भी सात-सात वर्णपर ही यति होती है। वसन्ततिलका छन्दमें सभी चरण क्रमशः तगण (ऽऽ।), भगण (ऽ।।), दो जगण (।ऽ।, ।ऽ।), दो गुरु (ऽऽ)-से युक्त होते हैं। इसीको सिंहोन्नता और उद्धर्षिणी भी कहते हैं। जिस छन्दके प्रत्येक पादमें भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), नगण (।।।) तथा दो गुरु (ऽऽ) हों उसका नाम इन्दुवदना होता है। जिसका प्रत्येक चरण नगण (।।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), रगण (ऽ।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ)-से संयुक्त होता है, उसीको सुकेशी छन्द कहते हैं। यहाँतक चौदह वर्णोंके चरणवाले शर्करी छन्दके अवान्तर भेदोंका वर्णन प्रतिपादित किया गया।
जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें चौदह लघु (चार नगण फिर दो लघु वर्ण) और अन्तमें एक गुरु हो, वह शशिकला छन्द है। इसी छन्दमें जब यति छः और नौ वर्णोंपर हो तो वह स्रक् अर्थात् माला नामक छन्द हो जाता है। जब वह यति आठ एवं सात वर्णोंपर हो तो वह मणिगुणनिकर नामक छन्द बन जाता है। मालिनी छन्द अपने प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), नगण (।।।), मगण (ऽऽऽ), यगण (।ऽऽ), यगण (।ऽऽ)-से सन्निहित होता है। इसमें आठ और सात वर्णोंपर यति होती है। प्रभद्रक नामक छन्दके प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।) और रगण (ऽ।ऽ) होता है। इसमें सात और आठ वर्णोंपर यति होती है। एला नामका छन्द सगण (।।ऽ), यगण (।ऽऽ), नगण (।।।), नगण (।।।) और यगण (।ऽऽ)-से संयुक्त होता है। चित्रलेखा छन्दके प्रत्येक चरणमें मगण (ऽऽऽ), रगण (ऽ।ऽ), मगण (ऽऽऽ), यगण (।ऽऽ) तथा यगण (।ऽऽ) होता है, यति सात और आठ वर्णोंपर होती है। यहाँतक पंद्रह वर्णोंके चरणवाले अतिशर्करी छन्दके अवान्तर भेदोंका वर्णन बताया गया है।
जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें भगण (ऽ।।),