भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 390
३८०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

छन्द-विधान (प्रस्तार-निरूपण)

सूतजीने कहा—अब प्रस्तारके* विषयमें बतला रहा हूँ। ऊपरके पादमें आदि अक्षर गुरु हो तथा उसके नीचेके पादमें लघु अक्षर हो, वह एकाक्षर प्रस्तार है। उसके बाद इसी क्रमसे वर्णोंकी स्थापना करे अर्थात् पहले गुरु और उसके नीचे लघु अक्षरकी स्थापना करे, यह द्वयक्षर-प्रस्तार है। प्रस्तारके अनन्तर नष्टका निरूपण इस प्रकार है—नष्ट संख्याको आधी करनेपर जब वह दो भागोंमें बराबर बँट जाय तब एक लघु लिखना चाहिये, यदि आधा करनेपर विषम संख्या प्राप्त हो तो उसमें एक जोड़कर सम बना ले और इस प्रकार पुनः आधा करे। ऐसी अवस्थामें एक गुरु अक्षरकी प्राप्ति होती है, उसे भी अन्यत्र लिख ले। जितने अक्षरवाले छन्दके भेदको जानना हो, उतने अक्षरोंकी पूर्ति होनेतक पूर्वोक्त प्रणालीसे गुरु-लघुका उल्लेख करता रहे।

अब उद्दिष्टके विषयमें बतलाया जा रहा है—उद्दिष्टकी प्रक्रिया जाननेके लिये छन्दके गुरु-लघु क्रमशः एक पंक्तिमें लिखकर उनके ऊपर क्रमशः एकसे लेकर दूने-दूने अङ्क रखता जाय अर्थात् प्रथम अक्षरपर एक, द्वितीयपर दो, तृतीयपर तीन—इस क्रमसे संख्या होगी। बिना प्रस्तारके ही वृत्त-संख्या जाननेके उपायको संख्या कहते हैं। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है—जितने अक्षरके छन्दकी संख्या जाननी हो, उसका आधा भाग निकालनेसे दोकी उपलब्धि होगी। उसे अलग रख ले। विषम संख्यामें एक घटाकर शून्यकी प्राप्ति होगी, उसे दोके नीचे रखकर शून्यके स्थानमें दुगुना करे, इससे प्राप्त हुए अङ्कको ऊपरके अर्धस्थानमें रखे और उतनेसे ही गुणा करे।

एकद्वयादिलगक्रियाकी सिद्धिके लिये मेरुप्रस्तारको बतलाया जा रहा है। किसी छन्दमें कितने लघु, कितने गुरु तथा एकाक्षरादि छन्दोंके कितने वृत्त होते हैं, इसका ज्ञान मेरुप्रस्तारसे होता है। मेरुप्रस्तारमें नीचेसे ऊपरकी ओर आधा-आधा अंगुल विस्तार कम होता जाता है। छन्दकी संख्याको दूनी करके एक-एक घटा दिया जाय तो उतने ही अंगुलका उसका अध्वा (प्रस्तारदेश) होता है। इस प्रकार छन्दःशास्त्रका सार बतलाया गया।

(अध्याय २१२)


सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण

सूतजीने कहा—हे शौनक! श्रीहरिसे सुनकर ब्रह्माजीने व्याससे सब कुछ देनेवाले ब्राह्मणादि वर्णोंके सदाचारको जैसे कहा है, उसी प्रकार मैं कहता हूँ।

श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्मशास्त्र)-का भली प्रकारसे अध्ययन करके श्रुतिप्रतिपादित कर्मका पालन करना चाहिये। (क्योंकि श्रुति ही सब कर्मोंका मूल है।) यदि (उपलब्ध) श्रुतियोंमें कोई कर्म ज्ञात नहीं हो रहा है तो उसको स्मृतिशास्त्रके अनुसार जानकर करना चाहिये (क्योंकि स्मृतिशास्त्र भी श्रुतिमूलक होनेके कारण ही कर्मके बोधमें प्रमाण माने जाते हैं) और स्मार्तधर्मके पालनमें असमर्थ होनेपर विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि वह सदाचारका पालन करे। कर्ममार्गका दर्शन करानेके लिये श्रुति तथा स्मृति—ये नेत्रस्वरूप हैं।


* किस छन्दके कितने भेद हो सकते हैं, सामान्यरूपसे इसका ज्ञान करानेवाली प्रणालीको 'प्रस्तार' कहा जाता है। प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, एकद्वयादिलगक्रिया, संख्या तथा अध्वयोग —ये छः प्रणालियाँ हैं।