गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 389, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] * छन्द-विधान (विषमवृत्तलक्षण) * ३७९
और तृतीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हो तो लवली नामक छन्द होता है। इसी प्रकार जब प्रथम पाद (आठ अक्षर)-के स्थानपर चतुर्थपाद (बीस अक्षर) और चतुर्थपादके स्थानपर प्रथम पाद हो तो उसे अमृतधारा नामक छन्द कहते हैं। यहाँतक पदचतुरूर्ध्व छन्दके अवान्तर भेदोंको बतलाया गया है।
जब प्रथम पादमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ) और एक लघु (।) — इस प्रकार दस अक्षर होते हैं, द्वितीय पादमें नगण (।।।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार दस अक्षर होते हैं, तृतीय पादमें भगण (ऽ।।), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), एक लघु (।) तथा एक गुरु (ऽ) — ये ग्यारह अक्षर होते हैं और चतुर्थ पादमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) तथा एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार तेरह अक्षर होते हैं तो वह उद्गता नामक छन्द कहलाता है। इसी उद्गता छन्दके तीसरे चरणमें जब रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), यगण (।ऽऽ) और एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार तेरह अक्षर हों और शेष तीन पाद पूर्ववत् अर्थात् उद्गता छन्दके समान ही हों तो सौरभक नामक छन्द होता है। इसी उद्गता छन्दके तीसरे चरणमें जब दो नगण (।।।, ।।।), दो सगण (।।ऽ, ।।ऽ) हों तथा शेष तीनों चरण उद्गताके ही समान हों तो ललित नामक छन्द होता है। ये सब उद्गता छन्दके अवान्तर भेद हैं।
जिसके प्रथम पादमें मगण (ऽऽऽ), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।) और दो गुरु (ऽऽ) — इस प्रकार चौदह अक्षर होते हैं, द्वितीय चरणमें सगण (।।ऽ), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार तेरह अक्षर होते हैं, तीसरे चरणमें दो नगण (।।।, ।।।) और एक सगण (।।ऽ) — इस प्रकार नौ अक्षर होते हैं तथा चौथे चरणमें तीन नगण (।।।, ।।।, ।।।), एक जगण (।ऽ।) तथा एक यगण (।ऽऽ) — इस प्रकार पन्द्रह अक्षर होते हैं तो ऐसा छन्द उपस्थितप्रचुपित नामवाला छन्द कहलाता है। इसी उपस्थितप्रचुपित छन्दके जब तीन चरण वैसे ही हों, केवल तृतीय चरणमें परिवर्तन हो, अर्थात् उसमें दो नगण (।।।, ।।।), एक सगण (।।ऽ), पुनः दो नगण (।।।, ।।।) तथा एक सगण (।।ऽ) — इस प्रकार अठारह अक्षर हों तो वह वर्धमान नामक छन्द होता है। उसी उपस्थितप्रचुपित नामक छन्दके जब तीन पाद (प्रथम, द्वितीय तथा चतुर्थ) समान हों, किंतु तृतीय पादमें तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।) और रगण (ऽ।ऽ) — इस प्रकार नौ अक्षर हों तो वह आर्षभ नामक छन्द होता है। इसी प्रकार उपस्थितप्रचुपित नामक छन्दका जब पहला पाद वही हो और शेष तीन पादोंमें तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।), तथा रगण (ऽ।ऽ) — इस प्रकार नौ अक्षर हों तो ऐसा छन्द शुद्धविराट् कहलाता है। ये छन्द उपस्थितप्रचुपित नामक छन्दके अवान्तर भेदोंमें आते हैं।
(अध्याय २११)