गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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छन्द-विधान (अर्द्धसमवृत्त लक्षण)
श्रीसूतजीने कहा—यदि छन्दके विषमपादमें तीन सगण (।।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ) वर्ण—इस प्रकार ग्यारह अक्षर हों एवं समपादमें तीन भगण (ऽ।।) और दो गुरु (ऽऽ) हों तो उसे उपचित्रक कहते हैं। जिस छन्दके विषमपादमें तीन भगण (ऽ।।), दो गुरु (ऽऽ) हों और उसके समपादमें एक नगण (।।।), दो जगण (।ऽ।) और एक यगण (।ऽऽ) हो, उसे द्रुतमध्या नामक छन्द माना गया है। जिस छन्दके विषम-पादमें तीन सगण (।।ऽ), एक गुरु और समपादमें तीन भगण (ऽ।।) एवं दो गुरु (ऽऽ) होते हैं, उसका नाम वेगवती है। जिस छन्दके विषमपादमें एक तगण (ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।), एक रगण (ऽ।ऽ), एक गुरु (ऽ) हो और समपादमें एक मगण (ऽऽऽ), एक सगण (।।ऽ), एक जगण (।ऽ।) तथा दो गुरु (ऽऽ) हों, वह भद्रविराट् नामक छन्द होता है।
यदि विषमपादमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), एक गुरु (ऽ) तथा समपादमें भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।) और दो गुरु (ऽऽ) हों तो उस छन्दको केतुमती कहा जाता है। जिस छन्दके विषमपादमें दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।) और दो गुरु (ऽऽ) तथा समपादमें जगण (।ऽ।), तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु (ऽऽ) होते हैं, उसको आख्यानिकी कहते हैं। यदि विषमपादमें जगण (।ऽ।), तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।) और दो गुरु (ऽऽ) तथा समपादमें दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु (ऽऽ) हों तो उसे विपरीताख्यानक छन्द कहा जाता है। ऐसा पिङ्गल मुनिका अभिमत है।
जब छन्दके विषमपादमें दो नगण (।।।, ।।।), एक रगण (ऽ।ऽ), एक यगण (।ऽऽ) और समपादमें एक नगण (।।।) दो जगण (।ऽ।, ।ऽ।), एक रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) होता है तो उसे पुष्पिताग्रा कहते हैं। यदि विषमपादमें रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), यगण (।ऽऽ) हो और समपादमें जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) हो तो उस छन्दका नाम वाङ्मती है।
(अध्याय २१०)
छन्द-विधान (विषमवृत्तलक्षण)
सूतजीने कहा—जिस छन्दके प्रथम पादमें आठ अक्षर, द्वितीय पादमें बारह अक्षर, तृतीय पादमें सोलह अक्षर तथा चतुर्थ पादमें बीस अक्षर होते हैं, वह पदचतुरूर्ध्व नामक छन्द है, यह इस छन्दका सामान्य लक्षण है। तात्पर्य यह है कि इस छन्दमें अनुष्टुप् छन्दके प्रथम पादके बाद प्रत्येक पादमें क्रमशः चार-चार अक्षर बढ़ते जाते हैं। इसी छन्दके चारों चरणोंमें जब दो अक्षर गुरु (ऽऽ) हों तो उसे आपीड छन्द कहते हैं। अन्तिम अक्षरोंको छोड़कर शेष अक्षर लघु (।) ही होते हैं। पदचतुरूर्ध्व नामक छन्दके प्रथम पादका द्वितीय आदि पादोंके साथ परिवर्तन होनेपर अनेक छन्द बनते हैं, यथा—प्रथम पादमें बारह और द्वितीय पादमें अठारह अक्षर होनेसे जो छन्द बनता है, वह कलिका (मञ्जरी) कहलाता है। इसमें प्रथम पादके स्थानमें द्वितीय पाद और द्वितीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हो जाता है। जब प्रथम पाद (आठ अक्षर)-के स्थानमें तृतीय पाद (सोलह अक्षर)