भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

काण्ड ] छन्द-विधान (समवृत्तलक्षण) ३७७


पादान्तमें यति होती हो, उसे वृत्त छन्द कहते हैं।

जिस छन्दमें मगण (SSS), रगण (S।S), भगण (SII), नगण ( । । ।), यगण ( । SS), यगण ( । SS), यगण ( । SS) हो और प्रत्येक चरणमें सात-सात वर्णोंपर यति होती हो, वह स्रग्धरा छन्द है। प्रत्येक चरणमें इक्कीस वर्णोंवाले इस छन्दको प्रकृति वर्गका छन्द माना गया है।

जिसके सभी पाद क्रमशः भगण (SII), रगण (S।S), नगण ( । । ।), रगण (S।S), नगण ( । । ।), रगण (S।S), नगण ( । । ।) तथा एक गुरु (S)-से संयुक्त हों और उनमें दस तथा बारह वर्णोंपर यति हो, उसे सुभद्रक छन्द कहते हैं। यह बाईस वर्णोंवाले आकृति छन्दके अन्तर्गत है।

जो नगण ( । । ।), जगण ( । S ।), भगण (SII), जगण ( । S ।), भगण (SII), जगण ( । S ।), भगण (SII), एक लघु ( । ) तथा एक गुरु (S)-से युक्त छन्द हो और उसमें ग्यारह तथा बारह वर्णोंपर यति हो, उसका नाम अश्वललित है। इसे अन्य ग्रन्थोंमें अद्रितनया भी कहा गया है। जिस छन्दमें मगण (SSS), मगण (SSS), तगण (SSI), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), एक लघु ( । ) तथा एक गुरु (S) होता है और जिसमें आठ, पाँच तथा दस वर्णोंपर यति होती है, उसको मत्ताक्रीड कहा जाता है। ये दोनों छन्द तेईस वर्णोंवाले विकृति छन्द-वर्गके अन्तर्गत हैं।

जिस छन्दका प्रत्येक पाद भगण (SII), तगण (SSI), नगण ( । । ।), सगण ( । । S), भगण (SII), भगण (SII), नगण ( । । ।), यगण ( । SS)-से संयुक्त होता है और उसमें पाँच, सात तथा बारह वर्णोंपर यति होती है, उसको तन्वी छन्द कहते हैं। यह तन्वी छन्द चौबीस वर्णोंके चरणवाले संकृति छन्द-वर्गका अवान्तर भेद है।

क्रौञ्चपदा नामका जो छन्द है, उस छन्दमें भगण (SII), मगण (SSS), सगण ( । । S), भगण (SII) एवं नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), एक गुरु (S) होता है और पाँच-पाँच, आठ तथा सात वर्णोंपर यति होती है। यह पच्चीस वर्णोंवाले अतिकृति छन्दके अन्तर्गत है।

अब छब्बीस वर्णोंवाले उत्कृति वर्गके छन्दको कहा जा रहा है, आप उसे सुनें—

जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें मगण (SSS), मगण (SSS), तगण (SSI), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), रगण (S।S) तथा सगण ( । । S) हों और आठ, ग्यारह एवं सात वर्णोंपर यति होती है, उसे भुजङ्गविजृम्भित कहते हैं। यह छब्बीस वर्णवाले उत्कृति छन्द-वर्गका एक भेद है।

जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें एक मगण (SSS), छह नगण ( । । ।, । । ।, । । ।, । । ।, । । ।, । । ।), एक सगण ( । । S) और दो गुरु (SS) हों, साथ ही नौ, छः-छः तथा पाँच वर्णोंपर यति हो तो उसको अपहाव कहते हैं। यह उत्कृति वर्गका ही दूसरा भेद है।

जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण ( । । ।, । । ।) और सात रगण (S।S, S।S, S।S, S।S, S।S, S।S, S।S) हों तो उसका नाम चण्डवृत्तप्रपात छन्द है। उसे दण्डक* भी कहा जाता है। यदि इस छन्दमें दो नगणको छोड़कर शेष रगण वर्णोंके साथ क्रमशः एक और दो अन्य रगण पदोंकी वृद्धि हो तो उसीसे व्याल और जीमूत आदि नामवाले दण्डक छन्द बनते हैं।

(अध्याय २०९)


* जिन वृत्तोंके प्रत्येक चरणमें सत्ताईस या इससे अधिक वर्ण होते हैं, उनका सामान्य नाम दण्डक है। चण्डवृत्तप्रपात आदि इसीके भेद हैं।