भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 405

काण्ड ] पार्वणश्राद्धविधि ३१५

सव्य होकर देवताओं (विश्वेदेवों)-को एवं अपसव्य होकर पितरोंको निमन्त्रित (आवाहित) करे। श्राद्धकर्ता 'ॐ स्वागतं भवद्भिः' (भवद्भिः स्वागतं स्वीक्रियताम्) आपलोग मेरा स्वागत स्वीकार करें—यह निवेदन विश्वेदेवों एवं पितरोंसे करे। तदनन्तर 'ॐ सुस्वागतम्' इस प्रकार विश्वेदेवों एवं पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मण बोलें। श्राद्धकर्ता 'ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्य एतत्पादोदकमर्घ्यं स्वाहा' कहकर देव-ब्राह्मणोंके चरणोंपर देवतीर्थसे समूल कुशोंके सहित जल प्रदान करे। यह कुश द्विगुणभुग्न (पितरोंके कार्यके लिये विहित मोटक)-रूपमें नहीं होना चाहिये। इसके बाद दक्षिणाभिमुख होकर दाहिने कंधेपर यज्ञोपवीत रखकर (अपसव्य होकर) पिता, पितामहके नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए 'ॐ एतत्पादोदकमर्घ्यं स्वधा' इस मन्त्रसे पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंके चरणोंमें पितृतीर्थसे द्विगुण-भुग्न कुश (मोटक) एवं पुष्पसहित जल प्रदान करे।

इसी प्रकार मातामह आदिके लिये उद्दिष्ट ब्राह्मणोंके चरणोंमें पादोदक और अर्घ्य समर्पित करे। इसके बाद 'ॐ एतदाचमनीयं स्वाहा' कहकर ब्राह्मणके हाथमें जल एवं 'ॐ एष वोऽर्घ्यः' मन्त्रसे अर्घ्य तथा पुष्प दे। तत्पश्चात् 'ॐ सिद्धमिदमासनम्' से (सिद्धमिदमासनं गृह्यताम्)—आसन सम्पन्न है, कृपया ग्रहण करें—ऐसा निवेदन करे। 'इह सिद्धमिदमासनम्।' (यहाँ हम लोगोंके लिये आसन सम्पन्न है) ऐसा कहकर प्रतिनिधि ब्राह्मण प्रतिवचन दें।

इसके बाद 'ॐ भूः', 'ॐ भुवः' इत्यादि सव्याहृतियोंका पाठकर देव-ब्राह्मणको पूर्वमुख और पितृब्राह्मणको उत्तरमुख बैठाकर निम्नलिखित मन्त्रका तीन बार जप करे—

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ते॥
(२१८।६)

तदनन्तर मास, पक्ष, तिथि, देश तथा पिता, पितामहका नाम एवं गोत्रका उच्चारण कर 'विश्वेदेवपूर्वकं श्राद्धं करिष्ये' यह संकल्प करे तथा 'ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा' का उच्चारण करे। इसके बाद 'ॐ विश्वेदेवानावाहयिष्ये' से प्रार्थना करके 'ॐ आवाहय' के द्वारा ब्राह्मणकी आज्ञा प्राप्त होनेपर 'ॐ विश्वेदेवा०', 'ॐ ओषधयः०' एवं—

आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः।
ये अत्र विहिताः श्राद्धे सावधाना भवन्तु ते॥
(२१८।७)

—इत्यादि मन्त्रोंसे श्राद्धकर्ता विश्वेदेवोंका आवाहन करे तथा 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः'—मन्त्रका तीन बार उच्चारणकर यव बिखेरे। श्राद्धकर्ता 'ॐ पात्रमहं करिष्ये' इस वाक्यसे अनुज्ञा प्राप्त करे तथा 'ॐ कुरुष्व' इससे ब्राह्मणोंके द्वारा अनुज्ञात होकर अग्रभागसे युक्त दो कुश ग्रहण करे। एक प्रादेश* (लम्बे) कुशके दो पत्रोंको लेकर 'ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ०' आदि मन्त्रसे दूसरे कुशपत्रके द्वारा उसका छेदन करे। इसके बाद 'ॐ विष्णोर्मनसा पूतेस्थ' से उन दो कुशपत्रोंका अभ्युक्षण कर दूसरे कुशपत्रके द्वारा त्रिर्वेष्टनपूर्वक उसे अर्घ्यपात्रमें स्थापित करे। तत्पश्चात् 'ॐ शं नो देवीरभिष्टय०' से उस पात्रमें जल तथा 'ॐ यवोऽसि०' इत्यादि मन्त्रसे जौ एवं 'ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां०' से उसी पात्रमें चन्दन प्रदान करे। फिर 'ॐ या दिव्या आपः पयसा०' इस मन्त्रके पाठके साथ 'ॐ एषोऽर्घो नमः' से ब्राह्मणोंके हाथमें अर्घ्यपात्रसे जल दे।

तदनन्तर श्राद्धकर्ता अर्घ्यपात्रस्थ अवशिष्ट संस्रवजल और पवित्रकको ग्रहणकर (अर्घ्यपात्रमें रखकर) ब्राह्मणके दक्षिणपार्श्वमें रखे और अर्घ्यपात्रको


*अँगूठे और तर्जनीको पूरा फैलानेपर बीचकी दूरीको प्रादेश कहते हैं।