भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 406
३९६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ऊर्ध्वमुख कुशके ऊपर स्थापित करके उसमें जल तथा पवित्रक भी (जो ब्राह्मणके दक्षिणपार्श्वमें रखा था) रख दे।

तत्पश्चात् 'ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्य एतानि गन्धपुष्पधूपदीपवासोयुग्मयज्ञोपवीतानि नमः' से विश्वेदेवोंको गन्धादि प्रदानकर समर्पित गन्ध आदिकी पूर्णताकी कामना 'गन्धादिदानमच्छिद्रमस्तु'—कहकर करे। विश्वेदेवोंके प्रतिनिधि ब्राह्मण 'ॐ अस्तु' से समर्पित चन्दनादिकी परिपूर्णता स्वीकार करे। ऋत्विक् ब्राह्मण 'ॐ अस्तु' से प्रत्युत्तर दे। श्राद्धकर्ता 'पितृपितामहप्रपितामहानां मातामह-प्रमातामहवृद्धप्रमातामहानां सपत्नीकानां श्राद्धमहं करिष्ये' ऐसा कहकर पितरोंके श्राद्धकी अनुज्ञा माँगे। ब्राह्मणोंके द्वारा 'कुरुष्व' इस वाक्यसे अनुज्ञात होनेपर 'ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च०' मन्त्रका तीन बार जप करे।

तदनन्तर पित्रादि एवं मातामहादिका नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए 'इदमासनं स्वधा' पदसे ब्राह्मणोंके वामपार्श्वमें आसन दानकर 'ॐ पितॄन् आवाहयिष्ये' से ब्राह्मणोंसे अनुज्ञाकी प्रार्थना करे और 'ॐ आवाहय' इस वाक्यसे ब्राह्मणोंके द्वारा अनुज्ञात होकर 'ॐ उशन्तस्त्वा०' एवं 'ॐ आयान्तु नः पितरः०' इत्यादि मन्त्रोंसे पितरोंका आवाहन करे। 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः' मन्त्रसे तिलका विकरण करे। पूर्वकी भाँति क्रमसे स्थापित अर्घ्यपात्रमें उदक दे तथा 'ॐ तिलोऽसि सोमदेवत्यो०' आदि मन्त्रोंसे तिल-दान करे।

इसके बाद दोनों हाथसे गन्ध, पुष्प प्रदानकर पितृपात्रको उठाकर 'ॐ या दिव्या०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करके अन्तमें पित्रादिका गोत्र, नामका उल्लेख कर 'एष तेऽर्घ्यः स्वधा' से पवित्रीके साथ अर्घ्यपात्रको ग्रहण करनेके बाद वामपार्श्वमें कुशाके ऊपर 'ॐ पितृभ्यः स्थानमसि' मन्त्रसे अधोमुख अर्घ्यपात्रको स्थापित करे, फिर 'ॐ शुन्धन्तां लोकाः पितृसदनाः०' का पाठकर उस अधोमुख पात्रका स्पर्श करना चाहिये। इसके बाद पितृतीर्थसे पित्रादिके आसनपर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप वस्त्रयुग्म एवं यज्ञोपवीतादि देकर गोत्रनामोच्चारणपूर्वक सपत्नीक पितृ, पितामह एवं प्रपितामहको 'एतानि गन्धपुष्पधूपदीपवासोयुग्मसोत्तरीययज्ञोपवीतानि वः स्वधा' इस वाक्यको पढ़कर पितृतीर्थसे जल छोड़े। 'गन्धादिदानम् अक्षय्यम् अस्तु' ऐसा श्राद्धकर्ताके कहनेपर 'संकल्पसिद्धिरस्तु' इस प्रकार ब्राह्मण कहे। इसी प्रकार मातामहादिके लिये भी अनुज्ञापनादि कर्म करे। 'ॐ या दिव्या०' इस मन्त्रसे भूमिका सम्मार्जन करे। तदनन्तर घृतमिश्रित अन्न ग्रहणकर सव्य होकर 'ॐ अग्नौ करणमहं करिष्ये' द्वारा पितृब्राह्मणकी सेवामें अनुज्ञाकी प्रार्थना करे। 'ॐ कुरुष्व' इस वाक्यसे ब्राह्मणके द्वारा अनुज्ञात हो, 'ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा' मन्त्रसे पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मणके हाथमें दो आहुति प्रदान करे। अवशिष्ट अन्न पिण्डार्थ स्थापित करके अन्नका आधा भाग पित्रादिके पात्रमें और मातामहादिके पात्रमें समर्पित करे।

इसके बाद जलपात्र मुद्रादि दक्षिणास्थापनपूर्वक भोजनपात्रके ऊपर कुशदान कर अधोमुख दोनों हाथोंके द्वारा भोजनपात्र स्पर्श करे। 'ॐ पृथिवी ते पात्रं०' इत्यादि मन्त्रपाठपूर्वक उस पात्रको अभिमन्त्रितकर उसपर अन्न परोसते हुए 'ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०' मन्त्रका पाठ करे। 'विष्णो हव्यं रक्षस्व' से अन्नके मध्यमें अधोमुख अंगुष्ठसे स्पर्श करके 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः' मन्त्रसे तीन बार जौ एवं 'ॐ निहन्मि सर्वं०' से पीली सरसोंका विकरण करना चाहिये। तदनन्तर 'धूरिलोचनसंज्ञकेभ्यो देवेभ्य एतदन्नं सघृतं पानीयं सव्यञ्जनं स्वाहा' कहकर विश्वेदेवोंको अन्न निवेदन