भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 407

कांड ] पार्वणश्राद्धविधि ३१७

करते हुए उसके ऊपर सजल कुशपत्र रखकर श्राद्धकर्ता ‘ॐ अन्नमिदम् अक्षय्यम् अस्तु’ ऐसा उच्चारण करे एवं निमन्त्रित ब्राह्मण ‘ॐ सङ्कल्पसिद्धिरस्तु’ इस प्रकार कहें।

तत्पश्चात् अपसव्य होकर पित्रादि-पात्रमें व्यञ्जनसहित घी मिले हुए अन्नको परोसकर उसके ऊपर भूमि-संलग्न कुशका स्थापन कर दोनों उत्तान हाथोंसे भोजनपात्र स्पर्श करते हुए ‘ॐ पृथिवी ते पात्रं०’ मन्त्रका पाठ करे। ‘ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०’ एवं ‘ॐ विष्णोः कव्यं रक्षस्व’ इन मन्त्रोंसे समर्पित अन्नमें अंगुष्ठका स्पर्श करे। ‘ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः’ से अन्नके ऊपर तिल फैलाकर पृथ्वीपर बायाँ घुटना टिकाकर ‘अमुकगोत्रेभ्यः अस्मत् पितृपितामहेभ्यः सपत्नीकेभ्यः एतदन्नं सघृतं सपानीयं सव्यञ्जनं प्रतिषिद्धवर्जितं स्वधा’ इत्यादि वाक्यसे सपत्नीक पिता-पितामहादिको नाम-गोत्र-उच्चारणपूर्वक अन्नका निवेदन करे। अन्नका संकल्प करके ‘ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं०’ मन्त्रसे दक्षिणमुख होकर जलकी धारा प्रदान करे। ‘ॐ श्राद्धमिदमच्छिद्रमस्तु एवं ॐ सङ्कल्पसिद्धिरस्तु’—इन दोनों मन्त्रोंका पाठकर ‘ॐ भूर्भुवः स्वः०’—इस व्याहृति-मन्त्रसे युक्त गायत्रीका उच्चारण कर विसर्जन करे। तदनन्तर ‘ॐ मधुवाता०’ मन्त्रका पाठकर तीन बार ‘मधु’ शब्दका उच्चारण करना चाहिये।

इसके साथ ‘यथासुखं वाग्यता जुषध्वम्’ का पाठकर ब्राह्मणोंके भोजन करते समय भक्तिपूर्वक ‘सप्तव्याधा०’ इत्यादि पितृस्तोत्रका पाठ करे<sup></sup>। इसके बाद ‘तृप्यस्व’ इस वाक्यका उच्चारण कर दक्षिणाभिमुख अपसव्य होकर ‘ॐ अग्निदग्धाश्च०<sup></sup> मन्त्रको पढ़कर भूमिमें कुशके ऊपर घीके साथ जलयुक्त अन्नको विकरित करे।

तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको मुखप्रक्षालनके लिये जल देकर प्रणवपूर्वक व्याहृतिके साथ गायत्री तथा ‘ॐ मधुवाता०’ इत्यादि मन्त्रोंका पाठकर मधु शब्दका तीन बार उच्चारण करे। ‘ॐ रुचितां भवद्भिः’ यह कहकर देव-ब्राह्मणोंसे विनम्रभावपूर्वक भोजनके रुचिपूर्ण (स्वादिष्ट) होनेका प्रश्न करे। देव-ब्राह्मणोंके द्वारा ‘सुरुचितम्’ यह उत्तर देनेपर ‘ॐ शेषमन्नम्’ यह विनम्रतासे प्रश्न करनेपर ब्राह्मण ‘ॐ इष्टैः सह भोजनम्’ अर्थात् इष्टजनोंके साथ आप भी भोजन करें—यह प्रत्युत्तर दें। तदनन्तर वामोपवीती (अपसव्य) होकर पित्रादि ब्राह्मणोंसे ‘ॐ तृप्ताः स्थ’ यह जिज्ञासा करे और उनके द्वारा ‘ॐ तृप्ताः स्मः’ इस वाक्यसे अनुज्ञात होकर भूमिका अभ्युक्षण और चतुष्कोण मण्डल बनाकर उसमें तिल विकरित करे। ‘ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः अमुकदेवशर्मन् सपत्नीकः एतत्ते पिण्डासनं स्वधा’ ऐसा कहकर पिण्डके लिये आसन दे और रेखाकरण करे। सप्रणव तथा व्याहृतिके साथ गाय्रीमन्त्र और ‘ॐ मधुवाता०’ आदि मन्त्रका पाठकर तीन बार ‘मधु’ शब्दका उच्चारण करते हुए घृतयुक्त अन्नसे पिण्डका निर्माण कर ‘ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः०’ इत्यादि वाक्यसे कुशोंके ऊपर पिता आदिके लिये पिण्ड प्रदान करे। पुनः रेखामध्यमें पहलेके समान पितामहको पिण्डदान तथा व्याहृतिपूर्वक गायत्री और ‘मधुवाता०’ का तीन बार जप करके पिण्डके समीपमें शेषान्नका विकरण करके ‘ॐ लेपभुजः पितरः प्रीयन्ताम्’ इस वाक्यसे (पिण्डाधार कुशमें)


१-सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ। चक्रवाकाः शरद्ीपे हंसाः सरसि मानसे॥
तेऽभिजाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः। प्रस्थिता दूरमध्वानं यूयं किमवसीदथ॥ (२१८।२०-२१)
२-अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु पराङ्गतिम्॥ (२१८।२२)