गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] कर्मविपाकका कथन ४११
कर्मविपाकका कथन
सूतजीने कहा—जगत्सृष्टि और प्रलय आदिकी चक्रगतिको जाननेवाले जो विद्वान् हैं, वे यदि आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक—इन तीन सांसारिक तापोंको जानकर ज्ञान और वैराग्यका मार्ग स्वीकार कर लेते हैं तो आत्यन्तिक लय (मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं। अब मैं उस संसारचक्रका वर्णन करूँगा, जिसको जाने बिना पुरुषार्थी परमात्मामें लीन नहीं होते।
प्राणके उत्क्रमण कालमें इस शरीरका परित्याग करके मनुष्य दूसरे सूक्ष्म शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है। इस मृत्युलोकसे मृत्युके पश्चात् जीवको यमराजके दूत बारह दिनकी अवधिमें यमलोकको ले जाते हैं। वहाँपर उस मरे हुए व्यक्तिके बन्धु-बान्धव जो उसके लिये तिलोदक और पिण्डदान देते हैं, वही सब यमलोकके मार्गमें वह खाता-पीता है। पापकर्म करनेके कारण वह नरकलोकमें जाता है और पुण्यकर्म करनेके कारण स्वर्ग। अपने उन पाप-पुण्योंके प्रभावसे नरक तथा स्वर्गमें गया हुआ प्राणी पुनः नरक और स्वर्गसे लौटकर स्त्रियोंके गर्भमें आता है। वहाँ विनष्ट न होकर वह दो बीजोंके आकारको धारण कर लेता है। उसके बाद वह कलल फिर बुद्बुदाकार बन जाता है। तत्पश्चात् उस बुद्बुदाकार रक्तसे मांसपेशीका निर्माण होता है। मांसपेशीसे मांस अण्डाकार बन जाता है। वह एक पल (परिमाण-विशेष)-के समान होता है। उसी अण्डेसे अंकुर बनता है। उस अंकुरसे अंगुली, नेत्र, नाक, मुख और कान आदि अङ्ग-उपाङ्ग पैदा होते हैं। उसके बाद उस विकसित अंकुरमें उत्पादक-शक्तिका सञ्चार होने लगता है। जिससे हाथ-पैरकी अंगुलियोंमें नख आदि निकल आते हैं। शरीरमें त्वचा और रोम तथा बाल निकलने लगते हैं। इस प्रकार गर्भमें विकसित होता हुआ यह जीव नौ मासतक अधोमुख स्थित रहकर दसवें मासमें जन्म लेता है। तदनन्तर संसारको अत्यन्त मोहित करनेवाली भगवान् विष्णुकी वैष्णवी माया उसे आवृत कर लेती है। यह जीव बाल्यावस्था, कौमारावस्था, युवावस्था तथा वृद्धावस्थाको प्राप्त करता है। इसके बाद यह पुनः मृत्युको प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार यह जीव इस संसारचक्रमें घटीयन्त्रके समान घूमता रहता है।
जीव नरकभोग करनेके पश्चात् पापयोनिमें जन्म लेता है। पतितसे प्रतिग्रह स्वीकार करनेके कारण विद्वान् भी अधोयोनिमें जन्म ग्रहण करता है। याचक नरकभोग करनेके बाद कृमियोनिको प्राप्त होता है। गुरुकी पत्नी अथवा गुरुके धनकी मनसे भी कामना करनेवाला व्यक्ति कुत्ता होता है। मित्रका अपमान करनेवाला गधेकी योनिमें जन्म लेता है। माता-पिताको कष्ट पहुँचानेवाले प्राणीको कछुएकी योनिमें जाना पड़ता है। जो मनुष्य अपने स्वामीका विश्वसनीय बन कर उसको छलकर जीवनयापन करता है; वह मृत्युके बाद व्यामोहमें फँसे हुए वानरकी योनिमें जाता है।
धरोहररूपमें अपने पास रखे हुए पराये धनका अपहरण करनेवाला व्यक्ति नरकगामी होता है। नरकसे निकलनेके पश्चात् वह कृमियोनिमें जन्म लेता है। नरकसे मुक्त होनेपर उस ईर्ष्यालु मनुष्यको राक्षसयोनिमें जाना पड़ता है। जो मनुष्य विश्वासघाती होता है, वह मत्स्ययोनिमें उत्पन्न होता है। यव और धान्यादि अनाजोंकी चोरी करनेवाले व्यक्ति मरनेके पश्चात् चूहेकी योनिमें जन्म लेते हैं। दूसरेकी स्त्रीका अपहरण करनेवाला मनुष्य खूँखार भेड़ियेकी योनिमें जाता है। जो मनुष्य अपने