गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४१२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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भाईकी स्त्रीके साथ सहवास करता है, वह कोकिलयोनिमें जन्म लेता है। गुरु आदिकी स्त्रियोंके साथ सहवास करनेपर मनुष्य सूअर-योनिको प्राप्त होता है।
यज्ञ, दान तथा विवाह आदिमें विघ्न डालनेवाले मनुष्यको कृमियोनि प्राप्त होती है। देवता, पितर और ब्राह्मणोंको बिना भोजन आदि दिये जो मनुष्य अन्न ग्रहण कर लेता है, वह नरकको जाता है। वहाँसे मुक्त होकर वह पापी काकयोनिको प्राप्त करता है। बड़े भाईका अपमान करनेसे मनुष्यको क्रौञ्च (पक्षिविशेष)-योनिकी प्राप्ति होती है। यदि शूद्र ब्राह्मण-स्त्रीके साथ रमण करता है तो वह कृमियोनिमें जन्म लेता है। उस ब्राह्मणीसे यदि वह संतानोत्पत्ति करता है तो वह लकड़ीमें लगनेवाले घुन नामक कृमिकी योनिको प्राप्त होता है। कृतघ्न व्यक्ति कृमि, कीट, पतङ्ग तथा बिच्छूकी योनियोंमें भ्रमण करता है। जो मनुष्य शस्त्रहीन पुरुषको मारता है, वह दूसरे जन्ममें गधा होता है। स्त्री और बच्चेका वध करनेवालेको कृमियोनि प्राप्त होती है। भोजनकी चोरी करनेवाला मक्खीकी योनिमें जाता है। अन्नकी चोरी करनेवाला बिल्लीकी योनि तथा तिलकी चोरी करनेवाला चूहेकी योनिमें जन्म लेता है। घीकी चोरी करनेवाला मनुष्य नेवला और मद्गुर (मत्स्यविशेष)-के मांसकी चोरी करनेवाला काकयोनिमें जाता है। मधुकी चोरी करनेपर मनुष्य दंशयोनि* तथा अपूप (पुआ)-की चोरी करनेपर चींटीकी योनिमें जन्म लेता है। जलका अपहरण करनेपर पापी व्यक्ति काकयोनिमें उत्पन्न होता है। लकड़ीकी चोरी करनेपर मनुष्य हारीत (हारिल नामक पक्षी) अथवा कबूतरकी योनिमें जन्म लेता है। जो प्राणी स्वर्ण-पात्रकी चोरी करता है, उसको कृमियोनिमें जन्म लेना पड़ता है। कपाससे बने वस्त्रोंकी चोरी करनेपर क्रौञ्च पक्षी, अग्निकी चोरी करनेपर बगुला, अंगराग आदि रंजकद्रव्य (शरीर-संस्कारकद्रव्य) और शाक-पातकी चोरी करनेपर मनुष्य मयूर होता है। लाल रंगकी वस्तुकी चोरी करनेसे मनुष्य जीवक (पक्षिविशेष), अच्छी गन्धवाली वस्तुओंकी चोरी करनेसे छुछुन्दर तथा खरगोशकी चोरी करनेसे वह खरगोशयोनिको प्राप्त होता है। कलाकी चोरी करनेपर मनुष्य नपुंसक, लकड़ीकी चोरी करनेपर घास-फूसमें रहनेवाला कीट, फूलकी चोरी करनेपर दरिद्र तथा यावक (जौका सत्तू, धान, लाख आदि) चुरानेपर पंगु होता है।
शाक-पातकी चोरी करनेपर हारीत और जलकी चोरी करनेपर चातक पक्षी होता है। जो मनुष्य किसीके घरका अपहरण करता है, वह मृत्युके पश्चात् महाभयानक रौरव आदि नरकलोकोंमें जाकर कष्ट भोगता है। तृण, गुल्म, लता, वल्लरी और वृक्षोंकी छाल चुरानेवाला व्यक्ति वृक्ष-योनिको प्राप्त होता है। यही स्थिति गौ, सुवर्ण आदिकी चोरी करनेवाले मनुष्योंकी भी है। विद्याकी चोरी करनेवाला मनुष्य विभिन्न प्रकारके नरकलोकोंका भोग करनेके पश्चात् गूँगेकी योनिमें जन्म लेता है। समिधारहित अग्निमें आहुति देनेवाला मन्दाग्नि-रोगसे ग्रस्त होता है।
दूसरेकी निन्दा करना, कृतघ्नता, दूसरेकी मर्यादाको नष्ट करना, निष्ठुरता, अत्यन्त घृणित व्यवहारमें अभिरुचि, परस्त्रीके साथ सहवास करना, पराये धनका अपहरण करना, अपवित्र रहना, देवोंकी निन्दा तथा मर्यादाके बन्धनको तोड़कर अशिष्ट व्यवहार करना, कृपणता करना तथा मनुष्योंका हनन करना—नरकभोग करके जन्म लिये हुए मनुष्योंके ये लक्षण हैं—ऐसा सभीको जान लेना चाहिये।
* दंशक—वनमक्षिका (बड़े मच्छर)।