गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा ४१५
नामसे जानना चाहिये। यह अक्षर परम ब्रह्म ॐकारके नामसे योगमार्गमें स्वीकृत है। अतः इस महामन्त्रका जप और ध्यान करते हुए अपनी मुक्तिके लिये इस प्रकार अपनेमें ब्रह्मभावनाका निश्चय करना चाहिये—
'मैं स्थूलदेहसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं जरा-मरणसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं इस पृथ्वीके सभी मलोंसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं वायु और आकाशसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं सूक्ष्मदेहसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं समस्त स्थान या अस्थानसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म* हूँ। मैं गन्धतन्मात्रासे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं श्रोत्रेन्द्रिय और त्वचा नामक इन्द्रियसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं जिह्वा तथा घ्राणेन्द्रियसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं प्राण तथा अपान वायुसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं व्यान और उदान वायुसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं अज्ञानसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकारसे रहित तुरीयावस्थामें विद्यमान परमपदस्वरूप, ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं नित्य-शुद्ध-बुद्ध, मुक्त, आनन्दमय, अद्वैत, ज्ञानस्वरूप, ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ।'
सूतजीने कहा— हे शौनक! इस प्रकार मैंने मुक्ति देनेवाले अष्टाङ्गयोगका वर्णन कर दिया है। जो लोग मायापाशसे आबद्ध हैं, वे सभी नित्य-नैमित्तिक ही कार्य करते हैं और उसीमें अन्ततक लगे रहते हैं। इस कारण उन्हें परमात्माका ऐक्य प्राप्त नहीं होता, वे पुनः इस संसारमें जन्म लेते हैं। जो अज्ञानसे मोहित हैं, वे ज्ञानयोग प्राप्त करके अज्ञानसे मुक्त हो जाते हैं। उसके बाद वह जीवन्मुक्त योगी न कभी मरता है, न दुःखी होता है; न रोगी होता है और न संसारके किसी बन्धनसे आबद्ध होता है। न वह पापोंसे युक्त होता है, न तो उसे नरकयातनाका ही दुःख भोगना पड़ता है और न वह गर्भवासमें दुःखी ही होता है। वह स्वयं अव्यय नारायणस्वरूप हो जाता है। इस प्रकारकी अनन्य भक्तिसे वह योगी भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् नारायणको प्राप्त कर लेता है।
ध्यान, पूजा, जप, स्तोत्र, व्रत, यज्ञ और दानके नियमोंका पालन करनेसे मनुष्यके चित्तकी शुद्धि होती है। चित्तशुद्धिसे ज्ञान प्राप्त होता है। प्रणवादि मन्त्रोंका जप करके द्विजोंने मुक्ति प्राप्त की है। इन्द्रने भी इन्द्रासन प्राप्त किया। श्रेष्ठ गन्धर्वों और अप्सराओंने उच्च पद प्राप्त किया। देवताओंने देवत्व और मुनियोंने मुनित्व प्राप्त किया। गन्धर्वोंने गन्धर्वत्व तथा राजाओंने राजत्वको प्राप्त किया।
(अध्याय २२६)
भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा
सूतजीने कहा— अब मैं विष्णुभक्तिका वर्णन करूँगा, जिससे सब कुछ प्राप्त हो जाता है। भगवान् विष्णु भक्तिसे जितना संतुष्ट होते हैं, उतना अन्य किसी साधनसे नहीं। भगवान् हरिका निरन्तर स्मरण करना मनुष्योंके लिये महान् श्रेयका मूल है। यह पुण्योंकी उत्पत्तिका साधन है और जीवनका मधुर फल है—
यथा भक्त्या हरिस्तुष्येत् तथा नान्येन केनचित् ॥
महतः श्रेयसो मूलं प्रसवः पुण्यसंततेः।
जीवितस्य फलं स्वादु नियतं स्मरणं हरेः ॥
(२२७।१-२)
इसलिये विद्वानोंने विष्णुकी सेवाको भक्तिका
* १-परम व्यापक ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, उसका कोई आश्रय नहीं है। इसलिये उसके स्थान या स्थानाभावकी कल्पना सर्वथा असम्भव है।